नई दिल्ली: एक बेटी जो अखाड़े में उतरती है तो बेटों की शामत आ जाती है. एक बेटी जो ऐसा धोबी पछाड़ लगाती है कि बड़े-बड़े मर्द पहलवान भी धूल फांकने लगते हैं. एक बेटी जो महज उन्नीस साल की उम्र में देश और दुनिया की बेटियों के लिए ताकत और हिम्मत की सबसे बड़ी मिसाल बन चुकी है. 
 
देश की उसी बहादुर बेटी का नाम दिव्या सैन है. दिव्या अखाड़े में लड़कों को भी चुटकियों में चारों खाने चित कर देती है. यूपी के मुजफ्फरनगर की ये मर्दानी, पहलवानी की दुनिया में नित नये रिकॉर्ड बना रही है. पुरुषों के परंपरागत खेल में लगातार अपनी जीत का परचम लहरा रही है. देश हो या विदेश, मिट्टी हो या मैट, दंगल में दिव्या के दांव का कोई जवाब नहीं.
 
दिव्या की जितनी उम्र नहीं उससे कई गुना ज्यादा मेडल उसके नाम हो चुके हैं. दिव्या के कमरे की दीवार पर कामयाबी का एक-एक किस्सा दर्ज है. दिवारों पर मेडल्स, ट्रॉफीज, सर्टिफिकेट्स उसके साहस और शौर्य के प्रतीक हैं. दिव्या के संघर्ष और सफलता की कहानी किसी फिल्मी फसाने से कम नहीं है.
 
 
मुजफ्फरनगर जिले के छोटे से गांव पुरबालियान में पैदा हुईं दिव्या के लिए कुश्ती की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाना बेहद मुश्किल था. एक तो रूढ़वादी परिवार और उस पर लड़कियों को लेकर गांव के लोगों की तंग सोच. ऐसे में दिव्या के लिए दंगल में उतरना ही किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं था.
 
पिता ने परिवार और समाज की परवाह किए बगैर बेटी को अखाड़े में डाला, लड़कों से भिड़ाया. पहलवानी की पहली ही आजमाइश में दिव्या ने अपने जबर्दस्त दांव से सबको हैरान कर दिया और तभी पिता ने तय कर लिया कि वो अपनी बेटी के हौसले को कामयाबी की मंजिल तक जरूर पहुंचाएंगे. लेकिन परिवार की लाचारी और समाज की बंदिशों के चलते उन्हें गांव छोड़कर दिल्ली आना पड़ा.
 
दरअसल दिव्या के पिता सूरजवीर काकरान और दादा भी पेशेवर पहलवान रह चुके हैं लेकिन पिता को अखाड़े में बड़ी कामयाबी नहीं मिली. लिहाजा उन्होंने अपने सपने को बेटी की आंखों से देखना शुरू किया. माली हालत खराब थी बावजूद इसके परिवार के साथ दिल्ली पहुंचे. गोकुलपुर की इन्हीं तंग गलियों में किराये पर मकान लिया और फिर शुरू हो गई दिव्या की मुश्किल ट्रेनिंग.
 
महज आठ साल की उम्र में दिव्या ने कुश्ती के दांव-पेंच सीखने शुरू कर दिए पर कामयाब रेसलर बनने के लिए बेहतर ट्रेनिंग के साथ-साथ अच्छी डाइट भी जरूरी है जबकि दिव्या का परिवार दिल्ली में एक-एक पैसे के लिए तरस रहा था. 
 
पिता की नौकरी से गुजारा नहीं हुआ तो मां ने पहलवानों के लिए लंगोट बनाना शुरू किया जिसे बेचने के लिए पिता सूरजवीर दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और हरियाणा के अलग अलग अखाड़ों में जाया करते थे. नौबत यहां तक आ गई कि बेटी को आगे बढ़ाने के लिए मां को अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रखना पड़ा.
 
 
बेटी ने कुश्ती में कमाल दिखाना शुरू किया तो परिवार में पैसों की किल्लत भी दूर होने लगी. दिल्ली और उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर तक हर दंगल में दिव्या ने अपने दम-खम से विरोधियों को पस्त किया. पहले सब जूनियर लेवल और फिर जूनियर लेवल पर खेलते हुए दिव्या ने देश हो या विदेश हर जगह अपने पराक्रम का परचम लहरा दिया. इसी दौरान किडनी की परेशानी ने दिव्या को दंगल से दूर कर दिया. 
 
जिस समाज को कल तक दिव्या की पहलवानी से ऐतराज था आज उन्हें अपनी बेटी की बहादुरी पर फख्र है पर इस मुकाम तक पहुंचने के लिए दिव्या को लंबी तपस्या करनी पड़ी है. दिव्या का आत्मविश्वास उसकी कामयाबी का सबसे कारगर मंत्र है लेकिन जीत की मंजिल तक पहुंचने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी था परिवार का भरोसा जीतना.
 
माता-पिता का समर्थन तो दिव्या को शुरू से ही हासिल था पर घर के बड़े-बुजुर्गों को मनाना आसान काम नहीं था. दादी दादी और ताऊ के कड़े ऐतराज के बावजूद पिता ने साथ दिया तो दिव्या अखाड़े में कूद पड़ी पर इस पहलवानी के लिए दिव्या को कदम कदम पर अग्निपरीक्षा देनी पड़ी.
 
तमाम नानुकर के बावजूद अब दिव्या का पूरा परिवार अपनी लल्ली के साथ खड़ा है. इस बेटी के लिए यही सबसे बड़ा मान भी है और अभिमान भी. देश की तमाम बेटियों के लिए भी दिव्या का यही संदेश है कि जो एक बार ठान लो उसे हर हाल में पूरा करो.

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