नई दिल्ली: इंडिया न्यूज शो बेटियां में देखिए उमूर खैर के संघर्ष की पूरी कहानी. उमूल कहती हैं कि दिन में स्कूल में पढ़ती थी फिर आधी रात तक बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी. 4-4 दिन बासी फफूंद लगी रोटी खाकर उमूल ने जैसे-तैसे गुजारा किया है.
 
16 बार हड्डी टूटने और 8 ऑपरेशन के बावजूद उमूल ने हार नहीं मानी. नेताजी सुभाषचंद्र बोस से प्रेरित होकर उमूल ने IAS की तैयारी पूरी की. क्लास में हमेशा टॉप तिया, विदेश दौरों पर भी नाम रोशन किया. यूपीएससी की परीक्षा में 42वां स्थान हासिल कर सबका आदर्श बनी. 
 
कहा जाता है कि कठिन परिस्थितियों के सामने अक्सर लोग हार जाते हैं. वो भी तब, जब आपका सपना देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक यूपीएससी क्लियर करने का हो और आपके हालात सही न हों. लेकिन उम्मुल खेर ने यूपीएससी क्लियर कर ये साबित कर दिया कि चाहे लाख मुश्किलें आ जाएं, अगर आप अपने सपनों को दिल से चाहते हों तो वो एक ना एक दिन वो जरूर पूरे होते हैं.
 
ऑस्टियो जेनेसिस जैसी बीमारी से जूझने के बावजूद उम्मुल खेर ने देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक यूपीएससी में पहले ही प्रयास में 420 रैंक लाकर सफलता की नई मिसाल कायम की है. ऑस्टियो जेनेसिस बीमारी में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और बार-बार हड्डियां टूटती रहती हैं. 
 
उमूल की बचपन की कहानी
उम्मुल का जन्म राजस्थान के पाली मारवाड़ में एक गरीब परिवार में हुआ. परिवार में तीन भाई-बहन और मां-पापा थे. जब उम्मुल पांच साल की थीं तो उनका परिवार दिल्ली आ गया. देश की राजधानी में दो जून की रोटी का बंदोबस्त करने के लिए पिता रेहड़ी-पटरी पर कपड़े बेचा करते थे. परिवार निजामुद्दीन इलाके की झुग्गी-झोपड़ी में रहने लगा.
 
2001 में कानून के लंबे चिट्ठे हाथ में लिए सरकारी बाबुओं ने घरों को अवैध करार करके उखाड़ फेंका. परिवार फिर तेज दौड़ती दिल्ली की सड़कों पर आ गया. गरीबी के चलते परिवार से पढ़ाई छोड़ने का दवाब दिया गया, लेकिन उम्मुल ने हार नहीं मानी और पढ़ाई जारी रखी.
 
इससे पहले कि वो अपने सपने के लिए कुछ कर पातीं उनके शरीर की कई बार हड्डी टूट चुकी थी. बावजूद इसके उम्मुल ने हार नहीं मानी. 2008 में अर्वाचीन स्कूल से 12वीं पास करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान से ग्रेजुएशन के लिए एडमिशन लिया.
 
2011 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद उम्मुल ने जेएनयू के इंटरनेशनल स्टडीज स्कूल से पहले एमए किया और फिर इसी यूनिवर्सिटी में एमफिल/पीएचडी कोर्स में दाखिला लिया. जेएनयू में दाखिले की प्रक्रिया आसान नहीं है क्योंकि यहां एंट्रेंस एग्जाम द्वारा चुनिंदा स्टूडेंट्स का एडमिशन हो पाता है.
 
जेएनयू से एमए की पढ़ाई के दौरान उन्हें मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप के तहत 2000 रुपए महीना मिलने लग गया और हॉस्टल में रहने की जगह भी. इसके बाद उम्मुल ने ट्यूशन पढ़ाना छोड़ अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया और इसी का नतीजा ये है कि आज उमूल यूपीएसी पास कर ली हैं.

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