नई दिल्ली. भारत में दो चीजों पर सत्ता अजमाने से नेता लोग कभी नहीं चूकते वो हैं – आस्था और आरक्षण. हिंदुस्तान की राजनीति इन्हीं दोनों के आसरे तीन दशक से चल रही है. एक के खेवनहार है भगवान राम यानी दाता हैं औऱ दूसरे का मतदाता. ये दोनों एक साथ चले और एक दूसरे के खिलाफ चले. आरक्षण वाले राम से दूर रहते थे और रामवाले आस्था को आरक्षण की काट मानते थे. इसी का राजनीतिक संस्करण बना सेक्यूलर और कम्यूनल. मजेदार बात ये है कि मोदी के सत्ता में आने के बाद आरक्षण वाले भी मंदिर-मंदिर ज्यादा आने जाने लगे और मंदिर की माला जपनेवालों को आरक्षण की आग से दो चार होना पड़ा.

हाल में ही आरएसएस मोहन भागवत उडडुपी में विश्व हिंदू परिषद के धर्म सम्मेलन में बोल रहे थे और ये साफ कर रहे थे कि जिस बीजेपी वीएचपी ने राम मंदिर की लड़ाई लड़ी है, मंदिर बनाने बनवाने का हक उसी का है- यानी क्रेडिट कहीं और भला कैसे जा सकता है और क्यों? यह सम्मेलन योगी आदित्यनाथ के जरिए समपन्न हुआ- इसका भी अपना मतलब होगा मोहन भागवत शुरु करें और योगी समाप्त. विकास के वादे पर सवार होकर सत्ता में आई बीजेपी- अयोध्या में सरयू किनारे राम का अलख जगाती है, हरियाणा में गीता पर विश्व सम्मेलन करती है, गाय की पूजा-संस्कृति के घंटे बजाती है, क्योकि उसे विकास की सवारी पर शायद यकीन नहीं है. उधर गुजरात में राहुल गांधी और हार्दिक पटेल है जो पाटीदारों को आरक्षण देने की बिसात पर अपनी अपनी सियासी बाजी खेल रहे हैं. जबकि सच दोनों को पता है.

आरक्षण इस देश में एक बीमारी की तरह रहा है, तय ये हुआ कि दस साल में हटा दिया जाएगा लेकिन आजादी के 70 साल बाद हटाने की कौन कहे इसे बढाने की ही राजनीति चलती रही और 2020 तक की मियाद बनी है. ऐसा लग रहा है कि गुजरात में पाटीदारों के आरक्षण की मांग का भला तभी हो पाएगा जब वहां से बीजेपी जाएगी. राहुल गांधी में हार्दिक पटेल भरोसा जता रहे हैं और बता रहे हैं कि अगर कांग्रेस की सरकार गुजरात में आई तो पाटीदारों को अलग से आरक्षण देने का कानून बनाएगी. लेकिन बात इतनी भर है नहीं. दरअसल गुजरात में जो आज बीजेपी सरकार है उसने अपैल 2016 में पाटीदारों समेत आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का एलान किया था. जल्दबाजी में अध्यादेश भी लाया गया लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने उसे असंवैधानिक बता दिया, क्योंकि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ऊपर चली गई थी जिसकी मनाही सुप्रीम कोर्ट ने कर रखी है. हाईकोर्ट का डंडा चला तो गुजरात सरकार सुप्रीम कोर्ट भागी, मगर वहां भी फटकार खानी पड़ी. नतीजा ये हुआ कि सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया.

सवाल ये है कि जिस मुद्दे पर मौजूदा सरकार की कोर्ट ने हवा निकाल दी वो दूसरी सरकार को छोड़ देगा. जाहिर है नहीं. तो फिर ये क्या है? पॉलिटिक्स, शुद्द पॉलिटिक्स. आइए आरक्षण की पूरी कुंडली को जरा ठीक से पढते हैं ताकि पता चले की कौन सा ग्रह कहां बैठा है और किस नक्षत्र में आरक्षण की आग उपजती है. फरवरी 2016 में हरियाणा की मनोहर खट्टर सरकार ने जाटों और पांच और जातियों के लिए 10 फीसदी आरक्षण देने का कानून बनाया. इससे आरक्षण की सीमा पचास फीसदी से ऊपर चली गई और नतीजा ये हुआ कि बाद में हरियाणा पंजाब हाईकोर्ट ने इसपर रोक लगा दी. कोर्ट ने पिछड़ा वर्ग आयोग से कहा है कि वो सर्वे करे और रिपोर्ट दे कि क्या ये जातियां सचमुच पिछड़ी हैं और इन्हें आरक्षण की जरुरत है.?

महाराष्ट्र में मराठों ने आरक्षण की आग ऐसी बोई की जून 2014 में तब की कांग्रेस एनसीपी सरकार ने चुनावों को देखते हुए मराठों के लिए 16 फीसदी आरक्षण का अध्यादेश लागू कर दिया लेकिन चुनाव में जीत गया बीजेपी शिवसेना गठबंधन. सत्ता में आकर देवेंद्र फडनवीस की मौजूदा सरकार ने कोई पंगा नहीं लिया और जो अध्यादेश पहले जारी हुआ था उसे कानून में बदल दिया. लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने ना सिर्फ आरक्षण पर रोक लगा दी बल्कि महाराष्ट्र पिछड़ा वर्ग आयोग और केंद्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने मराठों को पिछड़ा मानने से ही इंकार कर दिया.

ऐसा झटका राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी खा चुकी है. इसी महीने सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फैसले को गलत ठहराते हुए दो टूक कहा कि किसी भी हालत में आप आरक्षण को पचास फीसदी से ऊपर नहीं ले जा सकते. वसुंधरा राजे ने 25 अकटूबर को गुर्जरों के साथ चार और जातियों के लिये 5 फीसदी अलग से आरक्षण का कानून बना दिया जिसके चलते सीमा 54 फीसदी चली गई. जिसके बाद हाईकोर्ट ने पहले रोक लगाई और फिर सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया. ऐसा वसुंधरा ने दस साल पहले भी किया था और तब भी हाईकोर्ट ने रोक दिया था.

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