नई दिल्ली: पानी, तबाही का पानी है, जिधर चलता है जिंदगी के रहने-बसने की हर गुंजाइश को खत्म करता चलता है. उखाड़-पछाड़, तोड़-फोड़, उगल-निगल, डुबा-डरा का हाहाकारी शोर दूर दूर तक चलता रहता है. बिहार के कोसी की पेटी वाले औऱ यूपी में नेपाल की तराईवाले इलाकों में जिंदगी हर वक्त लड़खड़ाती चलती है. सैलाब आता है और उजाड़ जाता है.
 
तिनका-तिनका जोड़कर लोग जब थोड़ा संभलते हैं कि बाढ फिर आकर धावा बोल देती है. गांव बस्ती, खेत खलिहान तबाह कर जाती है. जिंदगी गिरने संभलने और संभलते ही फिर गिरने का सिलसिला सा हो गई है और ऐसा पीढियों से होता रहा है. 
 
बिहार में बाढ़ से हालत और बिगड़ गई है. मरने वालों की संख्या बढ़कर 253 तक पहुंच  गई है. मोतिहारी के 27 में से 21 ब्लॉक बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित हैं. गांव टापू बन गए हैं और घरों में भी पानी घुस गया है. बाढ़ की इस विभीषिका में सबसे अधिक 57 लोगों की मौत अररिया जिले में हुई है.
 
आपदा प्रबंधन के मुताबिक, सूबे के करीब 14 जिले बुरी तरह से बाढ़ की चपेट में हैं. बिहार में विकराल रूप धारण किये हुए बाढ़ से निपटने के लिए बिहार में 27 NDRF, 16 SDRF की टीमें तैनात की गई हैं. ये टीमें बाढ़ में घिरे लोगों को सुरक्षित स्थान में लाने का काम कर रही हैं. 
 
NDRF की एक-एक टीम सुपौल, गोपालगंज, दरभंगा, अररिया, मधुबनी, मुजफ्फरपुर और पटना जिलों में तैनात की गई है जबकि दो-दो टीमें किसनगंज और कटिहार जिलों में तैनात है. इसके अलावा 03-03 टीमों को मोतिहारी, बेतिया, पूर्णिया और सीतामढ़ी जिलों में तैनात किया गया है. 
 
हमारे नेताओं और आकाओं के लिए बाढ़ एक चुनौती है, सालों पहले भी थी, आज भी है और मुमकिन है आगे सालों रहेगी.  हवाई यात्राएं हो जाती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस हो जाते हैं, मदद की राशि जारी हो जाती है, एनडीआरएफ और अर्धसैनिक बलों या फिर सेना को उतार दिया जाता है. लेकिन सवाल ये है कि इससे कितनों को राहत मिलती है.
 
मत पूछिए कि एक घर बसाने में इंसान कितना खप जाता है. मत पूछिए कि अपनी एक पुश्त बनाने के लिए वो खुद को कितना खपा देता है. मत पूछिए कि इंसान होने के बावजूद कैसे अचानक वो मवेशियों से भी बुरे हाल में आ जाता है. मत पूछिए कि बाढ़ क्या क्या उजाड़ती है. क्या क्या तबाह करती है और मत पूछिए कि वही करोड़ों लोग इन लोगों को दशकों से वोट देकर विधानसभा और संसद भेजते आए हैं. 
 
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