नई दिल्ली: हमारे देश में महिलाओं की चोटी कट रही है, गांव-शहर-महानगर सब जगह चोटीकटवा घूम रहा है. यहां कट गई, वहां कट गई, इसकी कट गई, उसकी कट गई, ऐसे कट गई, वैसे कट गई- सब जगह बहस, चर्चा, बतकही में चोटी ही चल रही है. इसे अफवाह कहिए या अंधविश्वास लेकिन इसी में सारा देश हिचकोले खा रहा है.
 
जिसके बाल कट रहे हैं वो तो बदहवाश दिख ही रहा है, चोटीकटवा को ढूंढने-पकड़ने के चक्कर में दूसरे लोग भी सनके जा रहे हैं. हालत ये है कि कहीं 70 साल की बुजुर्ग को भीड़ पीट-पीट कर मार दे रही है तो कहीं 22 साल के नौजवान को चोटी काटवा बताकर बेरहमी से पिटाई कर दी जाती है.
 
बितते दिन के साथ हालात ये बन गए हैं. पुलिसवाले ताकीद कर रहे हैं, मीडिया वाले पर्दाफाश कर रहे हैं, तर्कशास्त्री समझा रहे हैं, नेता साजिश करनेवालों से आगाह कर रहे हैं- हो सब ऐसे रहा है जैसे चोटीकांड देश के सामने सबसे बड़ा खतरा हो. एक चोटी हाथ में लेकर कुछ लोग पूरे देश को उधर ही भगाए बैठे हैं, लेकिन ऐसी कई चोटी हम पता नहीं कब से जकड़े-पकड़े बैठे हैं, उसको काटनेवाला कोई दिखता ही नहीं है.
 
हम अंधेरगर्दी, कमअकली, धर्म में अधर्म, अंधविश्वास और अधमरी आदमियत जैसी न जाने कितनी चोटी ढोते हैं. लेकिन उसपर बहस नहीं करते- लड़ते हैं. समझने की कोशिश नहीं करते, अपने तरीके से समझाते हैं. बदलाव की बात नहीं करते, जो हैं या रहे हैं, वही बने रहने के बहाने ढूंढते हैं. हम कई चोटियां ढोते हैं. महिला की चोटी उसके ऋंगार का हिस्सा है लेकिन जिन चोटी की बात मैं कर रहा हूं वो देश समाज के बदसूरती की वजहें हैं.
 
आज इन तमाम चोटियों को खोल खोल ये समझने की कोशिश करेंगे कि चोटीकटवा को बेनकाब करना जरुरी है या हमारी समझ की अकड़ी-जकड़ी चोटी को काटना जरुरी है. पहले उस चोटी की बात जो इनदिनों. सात राज्यों की 50 करोड़ आबादी का सवाल है और वो ये कि महिलाओं की चोटी कौन काट ले जाता है ?
 
 
गाजियाबाद के लोनी इलाके में रहती हैं औऱ काफी घबराई हुई सी दिख रही है. इनका कहना है कि 2 अगस्त की दोपहर वो अपने बच्चों को स्कूल से लेकर आई. घर में बच्चों की ड्रेस बदल रही थी, इस दौरान इसे एक बाबा की परछाई दिखाई दी, जिसके बाद वो बेहोश हो गई. होश आया तो चोटी कट चुकी थी. उषा का बयान रिकॉर्ड पर है और पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है.
 
यह पूरा मामला सुनकर किसी को हंसी आ जाए. लेकिन चूंकि ये बयान है, लिहाजा हम आपके सामने जस का तस रख रहे हैं. गुड़गांव में डोमेस्टिक हेल्प का काम करती हैं यानी मेड हैं. सुमन की भी चोटी कट गई. इस पूरे मामलों को कुछ इस तरह से समझने की जरुरत है. ये दिमागी तौर पर बीमार लोगों की लाचारी या कुछ शरारती लोगों की साजिशों का नतीजा हो सकता है. लेकिन क्या अफवाह या फिर अंधविश्वास ही हमारे लिये सबसे बड़ा सवाल है?
 
 
सारे मीडिया में लगता है कि देश के सामने सबसे बड़ा खतरा चोटीकटवा ही है. तर्कशास्त्री औऱ मनोवैज्ञानिक जो कह रहे हैं वो वाजिब सी बात है और सच भी यही है. जिनके बाल कट रहे हैं, वे गरीब हैं, कम पढे लिखे हैं, डरी-सहमी जमात का हिस्सा हैं, वक्त के मारे हैं. लेकिन जो वक्त को मारने और समाज को डराने-सहमाने का ठेके लिये चलते हैं, वे क्यों नहीं बदलते. उनकी मूढमगजता और मनमानेपन की चोटी क्यों नहीं कटती ?

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