नई दिल्ली: भारत और चीन की सेना 100 मीटर के फासले पर एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं. वैसे अभी तक बॉर्डर पर सेना अपने हथियार को जमीन में टिका कर खड़ी है लेकिन चीन बार्डर से थोड़ी ही दूर पर उस तरह के इंतजाम में लगा है जिस तरह की तैयारी युद्द के लिए की जाती है. मतलब PLA , की एक पूरी कोर डिविजन तिब्बत में भेज दी गई है.
 
भारत कह रहा है कि जब तक चीन सड़क का काम बंद कर अपने सैनिक पीछे नहीं करता, बात नहीं होगी. चीन कह रहा है कि बात के लिये सैनिकों को पीछे करने की शर्त मानी ही नहीं जा सकती. साल 2013 में भी ये मामला सामने आया था. तब तनातनी चीन से कम पाकिस्तान से ज्यादा थी. तब ये कहा गया कि दो हफ्ते का गोला-बारूद ही मौजूद है. मतलब 14 दिन का.
 
 
उसी समय ये बात सामने आई कि भारतीय सेना 170 तरह के अस्त्र -शस्त्र का इस्तेमाल करती है. इसमें पिस्तौल की गोली से लेकर मोर्टार शेल, मिसाइल, लॉन्चर, तोप, फाइटर सब शामिल हैं. इन 170 तरीके से हथियार में 125 वॉर रिजर्व कैटेगरी में हैं. जिन्हें आपात स्थिति के लिए 24 घंटे तैयार रखा जाता है. ये गोला-बारूद सेना के अलग-अलग आयुध डिपो में रहते हैं.
 
ये डिपो देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद है. हथियार और गोला बारुद इतना होना चाहिए कि वॉर फ्रंट खुलने पर 40 दिनों तक इसकी कोई कमी नहीं हो. ये एक इंटरनेशनल मानक है. वैसे कम के कम 20 दिन के लिए गोला-बारूद तो होना ही चाहिए. जिसे बनाए रखने की जिम्मेवारी ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड पर होती है.
 
अब ऐसा भी नहीं कि चीन अगर आगे बढ़ रहा है तो भारत की तैयारी कमजोर है. वॉर रिजर्व का भंडार भी दुश्मन के मुताबिक तय होता है. चीन के साथ 3500 किलोमीटर की सीमा पर 1967 के बाद से कोई गोली चली ही नहीं. न कुछ ऐसा हुआ जिससे इस आशंका को बल मिले कि दोनों देशों की सेनाएं झड़प और युद्ध के लिए आमने-सामने आ जाएंगी.
 
 
लिहाजा भारत की ज्यादातर तैयारी पाकिस्तान को ध्यान में रखकर रही है. अब इसमें बड़ा स्ट्रैटजिक बदलाव हुआ है और, अब हर स्तर पर भारत चीन की ताकत को देखते हुए अपनी तैयारी कर रहा है. क्योंकि अब पाकिस्तान का मतलब सीधे-सीधे चीन होता जा रहा है और हिन्दुस्तान के लिए जिन ढाई मोर्चों पर चुनौती की बात हमारे जनरल कह रहे थे अब वो सोलह आने सच साबित हो रही है.
 
वैसे अभी जो भारत की तैयारी है वो 10 दिन की है, लेकिन इस ढाई मोर्चे के लिए है. वैसे कभी कभी युद्ध सिर्फ गोला-बारूद, टैंक-मिसाइल से नहीं लड़ा जाता. युद्ध लड़ना और जीतना, हालात औऱ जिस जगह लड़ाई होती है उसके भूगोल पर भी बहुत हद तक निर्भर करता है. नहीं तो दुनिया का नंबर वन मिलिट्री पावर अमेरिका, वियतनाम जैसे देश से नहीं हारता.
 
दुनिया के दूसरे बड़े मिलिट्री पावर रूस को अफगानिस्तान से पीठ दिखाकर भागना नहीं पड़ता और दुनिया की तीसरी बड़ी ताकत चीन को चुंबी घाटी और अरुणाचल में दो-दो बार मुंह की नहीं खानी पड़ती जहां आज वो जबर्दस्ती का तनाव बढ़ा रहा है.
 
साउथ चाइना सी में फिलिपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे छोटे देश के साथ का मामला हो या डोकलाम में भूटान के साथ का मामला. क्योंकि चीन अपने साथ हर विवाद में सुविधा का फैसला चाहता है. लिहाजा वो इंटरनेशनल कोर्ट के ऑर्डर को भी नहीं मानता. क्योंकि वो उसके पक्ष में नहीं था. 
 
 
साउथ चाइना सी के मामले में ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इंटरनेशनल कोर्ट ने वियतनाम-फिलिपींस के पक्ष में फैसला दिया और चीन ने कह दिया नहीं जी साउथ चाइना सी का पूरा इलाका हमारा है, यहां कोई नहीं आ सकता. इसी तरह डोकलाम में चीन कमजोर और आधारहीन ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला दे रहा है. जैसे डोकलाम का नाम चीन में बोले जाने वाले डोंगलांग से मिलता जुलता है. इसलिए ये उनका हो गया.
 
(वीडियो में देखें पूरा शो)

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