नई दिल्ली: अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया सलाह को लेकर देश भर में चर्चा तेज है. कोर्ट ने कहा मामला भावना है कि इसलिए इससे जुड़े पक्ष आपस में मिल बैठकर समाधान निकाल लें तो बेहतर है. मंदिर के हक में जो लोग हैं उन्हें अदालत का मशविरा ठीक लग रहा है लेकिन मस्जिद के पक्ष में खड़े पक्ष इस बात पर अड़े हैं कि ऐसे बड़े मामले का समाधान अदालत से ही आना चाहिए. 
 
 
क्या आप जानते हैं कि इस देश के एक प्रधानमंत्री ने अयोध्या मामले को हमेशा के लिये निपटाने का मन बना लिया था. वो हैं पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर. इनके साथ नरेश चंद्रा जो सरकार के कैबिनेट सेक्रेट्री और किशोर कुणाल का जो उस वक्त प्रधानमंत्री के ओएसडी हुआ करते थे. ये लोग अयोध्या मामले से जुड़े पक्षों से लगातार बातचीत कर रहे थे. चंद्रशेखर सरकार में तब के गृह राज्यमंत्री सुबोधकांत सहाय के निजी सचिव बीके सिन्हा और जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी. इन लोगों ने मंदिर के मामले को पूरी तरह खत्म करने का मन बना लिया था. 
 
 
दरअसल चंद्रशेखर उस वक्त प्रधानमंत्री बने जब मंदिर मामला अपने पूरे उफान पर था और इसी के चलते 11 महीने चलकर 10 दिसंबर 1990 को विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिर गई थी. तब के बीजेपी के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या की यात्रा पर निकले थे और समूचे देश में इस यात्रा को लेकर माहौल पूरा गरमाया हुआ था. लेकिन बिहार में लालू प्रसाद यादव जो उस समय बिहार के मुख्यमंत्री हुआ करते थे.
 
 
लालू ने आडवाणी का रथ बिहार के समस्तीपुर में रोक लिया, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. नतीजा ये हुआ कि विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से बीजेपी ने अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई. तब चंद्रशेखर वीपी सिंह से अलग होकर अपनी समाजवादी पार्टी बनाई और कांग्रेस ने उन्हें समर्थन देकर प्रधानमंत्री बना दिया. 
 
 
मंडल कमीशन की आंधी पर आए वीपी सिंह और कमंडल के तूफान पर सवार आडवाणी ने देश में राजनीति और समाज को पूरी तरह से आंदोलित कर रखा था. चंद्रशेखर चाहते थे कि अयोध्या मामले को निपटा दें, इसलिये पीएम बनते ही उन्होंने सभी पक्षों से खुद बातचीत करना शुरु कर दिया.
 
 
प्रधानमंत्री बनने के बाद 10 दिन के अंदर ही अयोध्या को लेकर चंद्रशेखर जी ने बैठक बुलाई थी. सभी पक्षों की राय मांगी गई थी. चंद्रशेखऱ ने अपना आकलन करवाया था कि हिंदू क्या चाहते हैं और मुसलमान क्या चाहते हैं. उन्होंने बैठक में तीन सीएम को ताकि कोऑर्डिनेट कर सकें. जिसमें मुलायम सिंह यादव, शरद पवार और भैरो सिंह शेखावत ये तीनों थे और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के 8 लोग थे और वीएचपी के 8 लोग भी शामिल थे.
 
 
कमोबेश मामला खत्म होने की तरफ बढ़ रहा था या फिर ये कह लें कि खत्म ही हो गया था. क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर इस मामले को खत्म का प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर कर रहे थे. इसलिए उन्होंने उस दौर में अपने तीनों खास सिपहसलार सीएम को बिठाया. ऐसे लोगों को जिनकी बात मुसलमान भी सुनें और हिंदू भी सुनें. इसलिए उन्होंने शायद मुलायम सिंह यादव को बुलाया और उनके साथ भैरो सिंह शेखावत को बिठाया.
 
 
क्योंकि शेखावत की छवि बीच वाली थी और बीजेपी में तब अटल-आडवाणी और जोशी के बाद वो चौथे बड़े नेता हुआ करते थे. उन्हें इस बात का जिम्मा दिया गया था कि वो बीजेपी की टॉप लीडरशीप को ये समझाने की कोशिश करें कि मामला ऐसी ही सुलझ सकता है. शरद पवार को इस मामले में इसलिए जानबूझकर रखा गया कि कांग्रेस के अलावा एक्रास पार्टी में उनकी पकड़ थी. वो पश्चिम भारत के नेताओं को समझा सकते थे.
 
(वीडियो में देखें पूरा शो)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

देश और दुनिया की ताजातरीन खबरों के लिए हमे फॉलो करें फेसबुक,गूगल प्लस, ट्विटर पर और डाउनलोड करें Inkhabar Android Hindi News App