नई दिल्ली. ATM और बैंक में लगे लोगों की कतार थोड़ी कमजोर भले हुई है लेकिन खत्म और यहां तक की कम नहीं हुई है. नोटबंदी से फायदा कम नुकसान ज्यादा दिख रहा है ? क्या इस फैसले को अपना नैतिक समर्थन देने वाले मध्यम वर्ग और गरीब-कमजोर तबके का सब्र जवाब देता जा रहा है ?
 
नोटबंदी पर नेताओं से ज्यादा राजनेताओं में खलबली क्यों हैं ? क्या ये सच है कि पिछले करीब 10 दिनों में जो करोड़ों-अरबों की रकम, काले धन कुबेरों ने खपा दी. दिल्ली की गीता कॉलोनी में यमुना किनारे श्मसान घाट में कोई 50 लाख रुपय एक पुराने बैग में फेंक कर चला गया. बैग खुलने पर 500 और 1000 के पुराने वाले नोट मिले थे. पुलिस ने शक के आधार पर दो लोगों को पकड़ा जिन्हें ये नोट सराय काले खां पहुंचाना था और फिर वहां से इसे दिल्ली से बाहर किया जाता.
 
महाराष्ट्र सरकार के सहकारिता मंत्री सुभाष देशमुख की कार की डिग्गी में नोटों का बंडल पकड़ी गई. देशमुख साहब ने इस मामले में सफाई जरूर दी लेकिन वो लोगों के गले उतर नहीं रही. जमशेदपुर में पुलिस थाने में टेबल पर बिखरे पांच सौ और हजार के नोटों को किसी ने सड़क किनारे फेंक दिया थे. फेंकने से पहले नोटों के टुकड़े कर दिए गए. ये रकम 25 लाख रुपए से ज्यादा रुपए है.
 
जबलपुर की बैंक के बाहर लोगों ने चप्पल-जूतों की लाइन ली. लाइन में खड़े हो हो कर शरीर जवाब देने लगा तो ये जुगाड़ निकाला कि आप इसे गलत नहीं कह सकते. कम से कम बेमतलब की धक्का-मुक्की और उसमें होने वाली चोरी-चकारी, छेड़खानी से तो निजात मिली. 
 
लंबी-लंबी लाइनों की समस्या ख़त्म हो जाती अगर 500 के नए नोट ATM तक तेजी से पहुंच जाते लेकिन मौजूद रफ्तार को देखते हुए लगता है कि ऐसा होने में कम से कम दो हफ्ते और लग सकते हैं. क्योंकि देश में ATM हैं 2 लाख, जिनमें पहले से नोट की चार ट्रे लगी हैं. पहले में हजार का नोट भरा होता है- जो खाली है. दूसरे में 500 का लेकिन बहुत कम मशीनों में 5 सौ के नए नोट पहुंचे हैं और नीचे के ट्रे में 100 रुपए के नोट भरे होते हैं.
 
फिलहाल करीब 22 हजार ATM में ही 500 के नए नोट के लिए ट्रे बदली गई है. इसकी बड़ी वजह है इंजीनियर्स की कमी. ATM को संभालने वाले इंजीनियर्स सिर्फ 3000-3500 ही हैं. ये सारे इंजीनियर्स दिन-रात 24 घंटे शिफ्ट में काम कर रहे हैं. 
 
कहा ये जा रहा है कि अगर ATM के ट्रे पहले से बदली जाने लगतीं तो नोटबंदी की ख़बर लीक हो सकती थी, क्योंकि जिनके पास करोड़ों-अरबों की काली कमाई है उनका तंत्र भी इतना बड़ा है कि वो इन खबरों के पीछे की खबर खोज लेते.
 
अगर बैंक में पहले से नोट पहुंचाए गए होते तो भी ख़बर लीक हो जाने का डर था और नोटबंदी के फैसले का सबसे बड़ा पहलू यही था कि इसकी गोपनियता कितनी और कैसे आखिरी वक्त तक बनाई रखी जाए और उस मामले में सरकार को शुरूआती कामयाबी जरूर हाथ लगी.
 
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