नई दिल्ली. समाजवादी पार्टी  का एक ऐसा सच है जिसने मुलायम सिंह के सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है और वो ये कि उनकी सियासी विरासत खानदान में क्या महाभारत लेकर खड़ी हो गई है. अगर आपको लगता है कि सब कुछ ठीक हो गया है या फिर कहा जा रहा है कि नेताजी हैं तो कुछ गड़बड़ नहीं होगा तो ये महज भुलावा है. 
 
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दरअसल आग को सिर्फ पर्दे में डाला गया है. उसे ना तो बुझाया गया है और ना ही वो बुझी है. सबसे पहले टकराव में एक तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और दूसरी तरफ उनके चचा शिवपाल सिंह यादव. इन दो चेहरों के बीच एक तीसरा चेहरा है मुलायम सिंह यादव. 
 
दोनों कहते हैं कि नेताजी जो कहेंगे वो मानेंगे लेकिन क्या एक ही शहर में एक ही सरकार में एक ही सड़क पर रहने वाले पिताजी, बेटेजी और चचाजी के बीच सब कुछ इतना गुपचुप चलता रहा कि नेताजी को आखिर में कूदना पड़ा और सबको उनकी बात माननी पड़ी. 
 
अखिलेश ने चचा शिवपाल को पहले से ज्यादा 13 मंत्रालयों का जिम्मा सौंप दिया लेकिन शिवपाल का जो सबसे अहम मंत्रालय था PWD उसे अपना पास रख लिया. शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर अखिलेश राजी हो गए लेकिन मुलायम ने अखिलेश को पार्लियामेंटरी बोर्ड का अध्यक्ष बनाकर संगठन में बेटे की हैसियत शिवपाल से ऊपर कर दी. 
 
अमर सिंह को पार्टी से निकालने की बात टाल दी गई लेकिन शिवपाल के दूसरे करीबी दीपक सिंघल की चीफ सेक्रेटरी के ओहदे पर वापसी नहीं हो सकी और ना होगी.
 
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