नई दिल्ली. आज़ादी के 70 साल पूरे होने पर भारत ने खूब जश्न मनाया. ऐसा लग रहा था कि आसमान से हमने तारे तोड़ लिए हैं, लेकिन इसी आज़ाद हिंदूस्तान में एक आदमी अपनी पत्नी का शव गठ्ठर की तरह 12 किमी. तक ढोकर ले गया, क्योंकि सरकारी अस्पताल ने एंबूलेंस भेजने से मना कर दिया था और उस आदमी के पास प्राइवेट गाड़ी को देने के लिए पैसे नहीं थे.
 
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वहीं दूसरी तरफ इसी देश में एक बेटा अपनी मां के शव को टुकड़ों में तुड़वाकर गठरी बनाता है और उसे कंधों पर ढोता है क्योंकि उसके पास अपनी मां को पोस्टमार्टम हाउस तक गाड़ी से ले जाने के पैसे नहीं थे.
 
ओडिशा में पिछड़े जिले कालाहांडी में एक आदिवासी व्यक्ति को अपनी पत्नी के शव को 10 किलोमीटर पैदल चल कर ले जाना पड़ा. दरअसल इस शख्स को अस्पताल से शव घर तक ले जाने के लिए वाहन के पैसे नहीं थे जिसके बाद ये शख्स खुद अपने कंधों पर शव को अपने घर ले गया. इतना ही नहीं दाना मांझी नाम के इस शख्स के साथ उसकी 12 साल की बेटी भी 12 किलोमीटर तक पैदल चली. माझी की पत्नी की मौत भवानीपटना में जिला मुख्यालय अस्पताल में टीबी से हो गई थी.
 
वहीं ओडिशा में सरकारी अव्यवस्था का एक और मामले सामने आया. बालासोर में अस्पताल से मॉर्चूएरी वैन नहीं मिलने पर रेलवे पुलिस ने महिला के मृत शरीर की हड्डियां तोड़कर उसे गठरी में भरवाया और फिर बांस के डंडे से लटकाकर मजदूरों के जरिये ढोकर स्टेशन पहुंचाया.
 
अस्सी वर्षीय सलमानी बेहरा की बालासोर के सोरो रेलवे स्टेशन के पास मालगाड़ी की चपेट में आने से मौत हो गई थी. मृत शरीर को पोस्‍टमार्टम के लिए बालासोर जिला ले जाना जरूरी था, मगर कोई एम्‍बुलेंस मौजूद नहीं थी. पोस्टमार्टम के लिए ले जाने के लिए प्राइवेट गाड़ी वाला 3500 रुपये मांग रहा था लेकिन उसके घर में 1000 रुपये से ज्यादा नहीं थे. तब मजबूरी में बेटे ने लाश को तोड़ा फिर एक बांस के डंडे में बांध कर स्टेशन पहुंचाया.
 
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