नई दिल्ली: येरुशलम सुर्खियों में हैं. दुनियां भर के लोगों का ध्यान उत्तरी कोरिया से हटकर अब येरुशलम की तरफ हो गया है. वजह है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का येरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देकर अमेरिकी दूतावास को तेल अबीब से येरुशलम में शिफ्ट करने का ऐलान. ऐसे में पूरी दुनियां में हलचल क्यों मची हैं और भारत किसकी तरफ है, ये जानना हर भारतीय के लिए जरूरी हो जाता है.

सबसे पहला सवाल है कि येरूळशलम आखिर है कहां और इतना प्रसिद्ध क्यों है कि उसे लेकर अमेरिका को बयान क्यों देना पड़ा? येरूशलम मिडिल ईस्ट का एक मशहूर शहर है और भूमध्य सागर और मृत सागर (डैड सी) के बीच में बसा है और उसके मशहूर होने की दो वजहें हैं. एक तो धार्मिक वजह है और दूसरी राजनीतिक. धार्मिक वजह ये है कि ये तीन धर्मों के लिए असीम श्रद्धा का केन्द्र है, यहूदी, ईसाई और इस्लाम.

आखिर क्यों तीन तीन धर्मों के लोगों की इतनी श्रद्धा इस शहर से जुडी है? टेम्पल माउंट पर ही सुलेमानी मंदिर बना है, जिसे यहूदी भी काफी पवित्र मानते हैं, कई बार उसे ध्वस्त किया गया इन सैकड़ों सालों में. उसके अवशेष बचे हैं तो मुसलमानों की अल अक्शा मस्जिद भी यहीं बनी है. मुसलमानों का मानना है कि मोहम्मद साहब का अंतिस समय इसी शहर में बीता और यहीं से वो जन्नत गए थे. वर्तमान में टैम्पल माउंट के 11 गेट हैं, जिनमें से 10 मुसलमानों के लिए हैं और 11 वां बाकी धर्मौं के लिए. इसलिए अगर येरुशलम में कुछ भी होता है, तो दुनियां भर के सारे मुस्लिम देशों की नजर उस पर रहती है, सऊदी अरब ने तो ट्रम्प के ऐलान का विरोध भी कर दिया है. सुन्नी मुस्लिमों के लिए मक्का और मदीना के बाद ये दुनियां की तीसरी सबसे पवित्र जगह है. दूसरे यहूदी मंदिर को ढहाकर बनाया गया डोम ऑफ रॉक भी इस्लाम मानने वालों के लिए श्रद्धा का केन्द्र है.

येरुशलम में 73 मस्जिदें हैं तो 158 चर्च हैं, इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक वक्त में ये ईसाइयों का कितना बड़ा गढ़ रहा होगा. ईसाई मानते हैं कि ये ही वो शहर है जहां कभी ईसा मसीह को सूली पर चढाया गया थी, इस शहर के बारे में बाइबिल में भी जिक्र है, और सोलोमन मंदिर के बारे में भी. ईसाई सपुखर चर्च को काफी पवित्र मानते हैं क्योंकि इसी जगह ईसा को सूली पर लटकाया गया था. तेल के अलावा येरुशलम भी बड़ी वजह है कि अमेरिका लगातार फिलीस्तीन और इजरायल के झगड़े में पड़ा रहता है.

यहूदियों के लिए वेस्टर्न वॉल काफी पवित्र है, जो उनके दूसरे मंदिर की बची हुई एकमात्र निशानी है. मंदिर के बीच के भाग पर मुस्लिमों ने कब्जा करके डोम ऑफ रॉक बना दिया गय़ा था, माना जाता है कि यहां से मोहम्मद साहब जन्नत को गए थे. कहने का मतलब ये है कि इस शहर में ऐसे कई स्थान हैं, कई इमारतें हैं जो अलग अलग धर्मों के लोगों की भावनाओं से सीधे जुड़ी हुई हैं. पहले यहूदी, फिर ईसाई और उसके बाद मुस्लिमों के कब्जे ने शहर को हर सदी में अलग अलग रंग में रंग दिया था.

इस शहर के राजनीतिक रूप से चर्चा में रहने की वजह है फिलीस्तीन और इजरायल का इस शहर पर कब्जे को लेकर झगड़ा. इजरायल ने 1948 में आजादी के वक्त ही येरुशलम को लेकर अपने इरादे जता दिए थे, 1967 के युद्ध में इजरायल ने पूर्वी येरुशलम पर कब्जा भी कर लिया था. 1980 में इजरायल ने इसे राजधानी बनाने का ऐलान तो कर दिया लेकिन ज्यादातर देश इसे मान्यता नहीं देते. करीब 86 देशों के दूतावास इजरायल के तेल अबीब में हैं.

चूंकि पूर्वी येरुशलम पर इजरायली कब्जे की निंदा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उस वक्त की थी, इसलिए अमेरिका के अलावा बाकी देश येरुशलम को इजरायल की राजधानी की मान्यता देने से हिचकते ही रहे. अमेरिका भी 1995 में कानून बनाकर मान्यता देने के बावजूद अपना दूतावास कभी वहां शिफ्ट नहीं कर पाया. लेकिन चूंकि ट्रम्प ने चुनावों से पहले ये बड़ा वायदा किया था और अमेरिका में मौजूद यहूदी लॉबी दवाब भी बना रही थी तो ट्रम्प को ऐलान करना पड़ा.

हालांकि ट्रम्प का दामाद जारेड कुशनर भी इस मामले से जुडा है क्योंकि उसका परिवार की जड़ें यहूदी धर्म में हैं. वो इस शांति अभियान के मुखिया के तौर पर काम कर रहा है और येरुशलम के कई बड़े चेहरों और सम्प्रदायों से लगातार मिल रहा है. दिलचस्प बात है कि उसकी बात इजरायल और फिलीस्तीन दोनों तरफ के नेताओं से हो रही है. ये अलग बात है कि फिलीस्तीन भी आसानी से मानने वाला नहीं है.

ऐसे में भारत के सामने बड़ी दिक्कत है कि क्या किया जाए? हालांकि मोदी सरकार ने आते ही इजरायल के समर्थन में बड़ा रुख ये दिखाया कि वो पहले ऐसे पीएम बने जो इजरायल की यात्रा पर गए. लेकिन मुस्लिम देशों सऊदी अरब, कतर, ओमान जैसे देशों की भी मोदी ने यात्रा की. एनडीए सरकार और बीजेपी का रुख इस वक्त अमेरिका और इजरायल के लिए काफी नरम है, लेकिन गुजरात चुनावों में फंसी सरकार ने अरसे तक तो इस मुद्दे पर खामोशी बरतना ही ठीक समझा, ये अलग बात है कि हार्डलाइनर रुख के लिए मशहूर सुब्र्हामण्यम स्वामी ने ये मांग की कि भारत को भी अपना दूतावास येरुशलम में शिफ्ट करना चाहिए. लेकिन जो ताजा बयान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार के हवाले से आया है, उसके मुताबिक, “India’s position on Palestine is independent and consistent. It is shaped by our views and interests, and not determined by any third country,”. साफ है कि भारत अभी दुनियां को केवल इतना बताना चाहता है कि वो अमेरिका के कहने पर नहीं चलेगा, जो भी फैसला होगा उसका अपना होगा. लेकिन इसका मतलब ये भी कतई नहीं कि भारत इजरायल के खिलाफ जाएगा.

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