नई दिल्ली. नेपाल में संविधान के विरोध में हो रहे मधेसी आंदोलन, जातिगत भेदभाव और एक्स्ट्रा जुडीशियल हत्या के खिलाफ भारत ने यूएन में इस मामले पर चिंता व्यक्त की है. भारत ने ह्यूमन राइट्स काउंसिल की बैठक में पहली बार इंटरनेशनल फोरम में शिकायत की है.  
 
यूएनएचआरसी की मीटिंग में भारत ने कहा है कि अप्रैल में नेपाल ने भयंकर भूकंप झेला है. उसके बाद नेपाल में नया संविधान अपनाया गया लेकिन कुछ समुदाय उसके खिलाफ लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. इन प्रदर्शनों में अभी तक 45 से ज्यादा आम लोगों की मौत हो चुकी है. कई लोग जख्मी भी हुए हैं. 
 
इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, भारत के एक्टिंग स्थायी प्रतिनिधि बीएन रेड्ड़ी ने नेपाल सरकार से एक विश्वसनीय जांच कराने की मांग की है. इसके अलावा उन्होंने नेपाल में चल रहे प्रदर्शनों और राजनीतिक अस्थिरता को सुलझाने के लिए चार कदम के सुझाव दिए हैं. 
  • नेपाल की समस्या को ताकत और सुरक्षा बलों के जरिये नहीं सुलझाया जा सकता है. 
  • नेपाल सरकार को संविधान सभी समुदाय के लिए बनाना चाहिए जिसमें सभी नागरिकों की आवाजों को प्रमुखता मिले और उनकी बातों को सुना जा सके. 
  • नेपाल ह्यूमन राइट्स कमीशन को वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए और उसे स्वायत्ता को बरक़रार रखना चाहिए.
  • महिलाओं और बच्चों के लिए एक स्वायत आयोग बनाना चाहिए. 
 
भारत के इस रुख पर नेपाल के उपमुख्यमंत्री थापा ने कहा है कि दुनिया के किसी भी देश में ऐसा संविधान नहीं हैं जो 100 फीसदी सही हो. इससे पहले भी भारत-नेपाल सीमा पर पैदा हुए तनाव के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली ने भारत को नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देने की चेतावनी दी थी. 
 
ओली ने आरोप लगाया था कि भारत, मधेशी दलों को 1751 किलोमीटर लंबी भारत-नेपाल की खुली सीमा पर नाकेबंदी के लिए उकसा रहा है. ओली ने कहा कि आखिर भारत क्यों चार मधेशी दलों के ही पीछे खड़ा नजर आ रहा है? उन्होंने कहा कि यह नेपाल सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने देश के सभी समुदायों की बातों को सुने और उनकी शिकायतों को दूर करे. उन्होंने कहा कि नए संविधान को संविधान सभा के 96 फीसदी सांसदों का समर्थन हासिल हुआ है और यह किसी देश के खिलाफ नहीं है.