नई दिल्ली. नौकरी की मियाद एक जैसी, पद भी एक जैसा, लेकिन पेंशन में करीब दो गुने का फर्क. ये हाल है देश के लिए जवानी कुर्बान करने वाले उन पूर्व सैनिकों का, जो ‘वन रैंक वन पेंशन’ की लड़ाई पिछले 40 साल से लड़ रहे हैं. पूर्व सैनिकों की दलीलों के आगे सरकार सुप्रीम कोर्ट में हार चुकी है, फिर भी पूर्व सैनिकों को उनका हक यानी कि ‘वन रैंक वन पेंशन’ नहीं मिला. 

छोटे-मोटे आंदोलनों के बाद सरकारों ने बजट में धनराशि मंजूर की, लेकिन पूर्व सैनिकों की पेंशन का विवाद जस का तस रहा. हर बार सरकार पूर्व सैनिकों को यही समझाती रही कि सब्र करो, ‘वन रैंक वन पेंशन’ मिलेगी. अब देश के 25 लाख पूर्व सैनिकों का सब्र जवाब देने लगा है. पूर्व सैनिकों ने देश भर में आंदोलन छेड़ दिया है और इसी के साथ ये बहस भी बड़ी हो गई है कि आखिर ‘वन रैंक वन पेंशन’ लागू करने में दिक्कत क्या है ?