नई दिल्ली. इस्लाम में धार्मिक कानूनों को लागू कराने में काज़ी का अहम रोल होता है. निकाह-तलाक के मामलों में तो काज़ी की हैसियत मुंसिफ जैसी होती है. अब तक काज़ी के ओहदे पर पुरुषों का एकछत्र राज था, जिसे जयपुर की दो महिलाओं ने चुनौती दे दी है.

जहां आरा और अफरोज़ बेगम नाम की दो महिलाओं ने बाकायदा काज़ी की डिग्री हासिल की है और खुद को काज़ी भी बता दिया है. कई मुस्लिम धर्मगुरुओं को इस बात पर एतराज़ है कि महिलाएं भला काज़ी कैसे बन सकती हैं ? वहीं काज़ी बनी महिलाएं और उनके समर्थक इसे वाजिब बता रहे हैं.

अब ये बड़ी बहस का मुद्दा बन चुका है कि महिलाएं काज़ी बनें, इस पर मौलाना राज़ी क्यों नहीं हैं ? क्या महिलाओं का काज़ी बनना इस्लाम विरोधी है ?

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