नई दिल्लीः निर्भया गैंगरेप मामले में सुप्रीम कोर्ट अब 12 दिसंबर को दोषियों की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करेगा. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आर. बानुमति और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने सोमवार को इस मामले में सुनवाई की. सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया गैंगरेप के दोषी विनय, अक्षय और पवन के वकील एपी सिंह से तीन हफ्ते के भीतर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने दोषी मुकेश की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान साफ किया कि इस मामले में दूसरे पक्ष यानी दिल्ली पुलिस को कोई नोटिस या जवाब दाखिल करने के आदेश नही देंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक पीठ के फैसले के मुताबिक पुनर्विचार पर सुनवाई के लिए केवल आधे घंटे का समय दोनों पक्षों को दिया जाएगा, इसलिए इसमें कोई भी जवाब दाखिल करने का समय नहीं देंगे. 12 दिसंबर को मामले की सुनवाई के दौरान ही दोनों पक्षों को अपनी बात रखनी होगी. बता दें कि दोषी मुकेश की तरफ से आज बहस के लिए समय की मांग की गई थी और कहा गया कि मामले की सुनवाई किसी और दिन की जाए.

सजायाफ्ता मुकेश ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की है. याचिका में फांसी की सजा पर फिर से विचार करने की गुहार लगाई है. याचिका में फांसी पर अंतरिम रोक की भी मांग की गई है. खुली अदालत में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई होगी. दरअसल पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने आदेश दिया था कि फांसी की सजा के मामलों में तीन जजों की बेंच सुनवाई करेगी और पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई होगी.

गौरतलब है कि 16 दिसंबर, 2012 की रात हुए निर्भया गैंगरेप केस ने देश ही नहीं बल्कि दुनिया को हिला कर रख दिया था. निर्भया के साथ दरिंदगी की इंतेहा पार करने वाले 6 आरोपी थे, जिसमें एक नाबालिग था. एक आरोपी ने जेल में खुदकुशी कर ली. कानून के मुताबिक सजा पूरी होने पर नाबालिग को रिहा कर दिया गया. जबकि 4 अन्य दोषियों को साकेत की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी. 14 मार्च, 2014 को दिल्ली हाई कोर्ट ने भी फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी. इसी साल 5 मई को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए फांसी की सजा को बरकरार रखा था.

फैसले के दौरान निर्भया के माता-पिता कोर्ट में मौजूद थे. सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की सजा बरकरार रखते हुए कहा था कि दोषियों ने सेक्स और हिंसा की भूख के चलते बड़ी वारदात को अंजाम दिया. दोषी अपराध के प्रति आसक्त थे. जैसे अपराध हुआ, ऐसा लगता है अलग दुनिया की कहानी है. जजों के फैसला सुनाने के बाद कोर्ट रूम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था. दोषियों की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा पर रोक लगा दी थी. इसके बाद तीन जजों की बेंच को मामले को भेजा गया और कोर्ट ने केस में मदद के लिए दो एमिक्‍स क्यूरी नियुक्त किए गए थे.

 

निर्भयाकांड के चार साल बाद भी कुछ नहीं बदला