नई दिल्ली. बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय ने आने वाले समय में अवार्ड लेने या मना करने को बड़ी बात बताते हुए कहा है कि लेखकों को वोट या बहुमत में रहने की जरूरत नहीं है और न ही उन्हें तालियां चाहिए. 
 
नेशनल अवार्ड लौटाने के बाद बीबीसी को दिए इंटरव्यू में अरुंधति ने कहा, “लेखकों का काम बहुमत में रहना नहीं है. मैं अगर अकेली भी हूं तब भी मैं जो सोचती हूं वो लिखूंगी भले ही सब लोग मेरे ख़िलाफ़ हों. हम नेता नहीं हैं. मैं ये नहीं कह रही हूं कि आप मुझे वोट दो, मेरे लिए तालियां बजाओ.”
 
मैंने कांग्रेस की सरकार में ठुकरा दिया था पुरस्कार
 
अरुंधति ने कहा कि 2005 में जब कांग्रेस का राज था, तब मैंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने से मना कर दिया था तो लोग उस वाकये का हवाला देकर इस समय अवार्ड लौटा रहे लोगों को निशाना बना रहे हैं कि अरुंधति ने तो अवार्ड लिया ही नहीं था. आप लोगों ने तब ले लिया और अब वापस कर रहे हैं. 
 
 
अरुंधति ने कहा, “मैं उन लोगों के साथ खड़ी होना चाहती थी. मैं बहुत खुश हूं कि पहले इतने सारे लोगों ने अपने पुरस्कार लौटाए और अब जाकर मैंने किया. वरना पहले बहुत बार ऐसा मैं पहले करती रही हूं.”
 
 
बीजेपी और कांग्रेस के विरोध से जुड़े एक सवाल के जवाब में अरुंधति ने कहा, “बीजेपी या आरएसएस के ख़िलाफ़ होना कोई ख़राब बात नहीं है. मैं नहीं मानती कि कांग्रेस वास्तव में बीजेपी के ख़िलाफ़ है. कांग्रेस जो रात में करती है, बीजेपी दिन में करती है.”