नई दिल्ली. भारत दुनिया के ऐसे देशों में से है, जिस पर बीमारियों का अत्यधिक बोझ है. बहुत सारी स्वास्थ्य योजनाएं अपना लक्ष्य और मकसद पूरा नहीं कर सकी हैं. साल 2007 में डब्लयूएचओ के आंकड़ों के मुताबिक, ‘पर कैपिटा’ स्तर पर स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में 191 देशों में भारत 164वें पायदान पर है. भारत का स्वास्थ्य पर खर्च चीन से 30 फीसदी कम है. 
यह माना जा रहा है कि देश में खराब स्वास्थ्य का प्रमुख कारण सरकार द्वारा स्वास्थ्य पर कम खर्च करना है, जो कि दुनिया में सबसे कम है. इसे देखते हुए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने स्वास्थ्य बजट में बढ़ोत्तरी की मांग की है. 
 
भारत के योजना आयोग द्वारा बनाए गए यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समूह ने नवंबर 2011 में 2022 के लिए रिपोर्ट दी थी. इसमें स्वास्थ्य फाइनेंस, स्वास्थ्य ढांचे, स्वास्थ्य सेवा शर्तो, कुशल कामगारों, दवाओं और वैक्सीन तक पहुंच, प्रबंधकीय और संस्थागत सुधार और सामुदायिक भागेदारी जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई थी. 
 
आईएमए के महासचिव डॉ के.के. अग्रवाल का कहना है कि सरकार को मौजूदा जीडीपी 1.1 फीसदी स्वास्थ्य बजट खर्च को बढ़ा कर 12वीं योजना के तहत कम से कम 2.5 फीसदी तक करना चाहिए और 2022 तक जीडीपी का 3 फीसदी होना चाहिए. सरकार को चाहिए कि वह प्राथमिक स्वास्थ्य पर 55 फीसदी, द्वितीयक पर 35 फीसदी और तीसरे देखभाल सेवाओं पर 10 फीसदी तक बजट खर्च करने का प्रावधान बनाए.