मुंबई. एक तरफ खेतों-किसानों से जुड़ी समस्याएं संसद में गूंज रहीं हैं, दूसरी तरफ महाराष्ट्र रेवेन्यू डिपार्टमेंट द्वारा जारी किए गए आंकड़े चीखते हुए किसानों का हाल बयां कर रहे हैं. विभाग द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक 2015 में जनवरी से जून के बीच 1300 किसानों ने आत्महत्या की. 2014 के 12 महीनों में 1981 किसानों ने आत्महत्या की थी और इस साल छह महीने में ही आंकड़ा बीते साल की तुलना में 66 फीसदी पहुंच चुका है. इन आंकड़ों के मुताबिक 2013 में 1296 किसानों ने आत्महत्या की थी.

इन आंकड़ों की तुलना करने पर लग रहा है कि इस साल आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या बीते साल से ज्यादा हो जाएगी. आलोचकों का मानना है कि रेवेन्यू विभाग द्वारा जारी किए गए यह आंकड़े भी सही नहीं है. विभाग पर आरोप है कि वह हमेशा आंकड़ों को कम करके दिखाता है. आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या तो और भी ज्यादा है. एक तथ्य यह भी है कि देश के सभी राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या करते हैं. 

रेवेन्यू डिपार्टमेंट के मुताबिक आत्महत्या करने वाले किसानों में से केवल 55 फीसदी ही मुआवजे के हकदार हैं. आत्महत्या करने वाले जिन किसानों के नाम पर जमीन होगी और जिनके पास लोन लेने के दस्तावेज होंगे, वही मुआवजे के हकदार होंगे. किसानों को ऋण के मुद्दे पर विपक्ष आक्रामक मुद्रा में है और उम्मीद की जा रही है कि सीएम देवेंद्र फडणवीस सोमवार को सदन में इस संबंध में कोई बयान देंगे.

हमेशा की तरह विदर्भ में किसानों द्वारा आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं. इस इलाके के 671 किसानों ने आत्महत्या की. पूरे राज्य में जितने किसानों ने आत्महत्या की, उसमें से आधे तो इसी इलाके से आते हैं. जून तक मराठावाड़ा इलाके के 438 किसानों ने आत्महत्या की जो कुल संख्या के 34 फीसदी हैं.