नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने भारत में तमाम पोर्न वेबसाइट्स को ब्लॉक करने का निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एचएल दत्तू ने इस मामले से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, ‘‘इस तरह का अंतरिम आदेश कोर्ट द्वारा नहीं दिया जा सकता. कोई कोर्ट आकर यह कह सकता है कि मैं एक एडल्ट हूं और आप मुझे मेरे कमरे के भीतर पोर्न देखने से कैसे रोक सकते हैं? यह संविधान के आर्टिकल 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन है. हालांकि, यह एक सीरियस मुद्दा है और कुछ कदम उठाए जाने चाहिए. देखते हैं कि केंद्र इस मसले पर क्या कदम उठाता है?’’

जनहित याचिका पर हो रही थी सुनवाई
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को इस बारे में डिटेल एफिटेविट सौंपने के लिए 4 हफ्ते का वक्त दिया है. कोर्ट ने यह कमेंट इंदौर के वकील कमलेश वासवानी द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान किया. जनहित याचिका में सभी पोर्न साइट्स को ब्लॉक करने की मांग की गई थी. याचिका में कहा गया था कि जब तक गृह मंत्रालय इस पर कोई कदम नहीं उठाता, तब तक सभी पोर्न साइट्स को ब्लॉक करने का अंतरिम आदेश जारी किया जाए. याचिकाकर्ता के वकील विजय पंजवानी ने दलील दी कि बच्चों और महिलाओं के ज्यादातर अपराध पोर्न वीडियो से प्रभावित होकर किए जाते हैं. इंटरनेट कानूनों की गैरमौजूदगी लोगों को पोर्न देखने के लिए बढ़ावा देती है. 20 करोड़ से ज्यादा क्लीपिंग्स उपलब्ध हैं, जो इंटरनेट से सीधे डाउनलोड किए जा सकते हैं या सीडी में कॉपी किए जा सकते हैं.

पिछले रुख से उलट
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी उसके पुराने रुख से अलग है, जिसके मुताबिक इस तरह के अश्लील कंटेंट को ब्लॉक करने की बात कही गई थी. सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने अगस्त 2014 में इसी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान ऑनलाइन कंटेंट पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कानून की बात कही थी. तत्कालीन चीफ जस्टिस आर.एम.लोढ़ा बेंच की अध्यक्षता कर रहे थे. उन्होंने डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्यूनिकेशन, इन्फॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्ट्री और गृह मंत्रालय को इस खतरे से निपटने के लिए एक संयुक्त कोशिश करने को कहा था.

एजेंसी