लखनऊ. यूपी पुलिस के बारे में हमेशा कहा जाता है कि वो हमेशा अपराध होने के बाद मौके पर पहुंचती है. सूबे में अपराध की दर को लेकर पुलिस की छवि काफी खराब है, लेकिन जल्द ही पुलिस की ये छवि बदल सकती है. और हो सकता है कि पुलिस घटना से पहले ही मौके पर पहुंच जाएं. इससे क्राइम कंट्रोल में मदद मिलेगी.
 
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आगरा के अंबेडकर विश्वविद्यालय के विद्वानों ने सीआईआईएल मैसूर, यूके के विद्वानों के साथ मिलकर ऐसा प्रोजेक्ट तैयार किया है जिससे बवाल से पहले ही पुलिस का अलार्म बज जाएगा. यह संभव होगा सेंसर आधारित सॉफ्टवेयर से जो माहौल की आक्रामकता को पहले ही भांप लेगा.
 
 बड़े शहरों में सुरक्षा के मद्देनजर सीसीटीवी कैमरे लगे होते है झगड़ा या अपराध होने के दौरान ये कैमरे इन्हें रोकने में मददगार नहीं हो सकते. इसके लिए गुस्से के माहौल की आवाज, बातचीत की ‘टोन’ बड़ी भूमिका निभा सकती है.
 
आगरा विवि का भाषा विज्ञान विभाग, हडर्स विवि यूके, जेएनयू दिल्ली, माइक्रोसॉफ्ट और सीआईआईएल मैसूर के विद्वान इस दिशा में काम कर रहे थे. ‘यूके-इंडिया एजुकेशन एंड रिचर्स इनीशिएटिव्स’ के तहत विद्वानों के बीच ‘टीमेटिक पार्टनरशिप’ हुई थी. इसके तहत आवाज, शरीर के हावभाव से गुस्से की पहचान पर शोध किया गया.
 
‘कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक’ का सहारा लिया गया. कैमरे के साथ उच्च क्षमता के वायस सेंसर्स लगाए गए हैं. जो हल्की आवाज को भी पकड़कर उसकी टोन पहचान लेंगे. जैसे दिमाग गुस्से या आक्रामकता की पहचान करता है, वैसे ही इसके फीचर इन्सानी दिमाग की तरह मानव भाषा को पहचान पाएंगे. प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया है और जनवरी 2017 में यह पुलिस के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध करा दिया जाएगा.