नई दिल्ली. पीरियड्स या महावारी को लेकर पूरे समाज में तरह-तरह की बातें बनाई जाती हैं.महिलाओं के शरीर से जुड़ी प्रक्रिया जिसे मासिक धर्म, माहवारी या अंग्रेजी में मेन्सट्टयूरेशन कहते हैं. जो हरेक महिला के जीवन का अहम हिस्सा है. लेकिन भारतीय समाज में इस पूरी प्रक्रिया को एक मानवतापूर्ण एवं वैज्ञानिक दिशा देने की बजाए स्त्री की पवित्रता और अपवित्रता से जोड़कर एक ‘सोशल टैबू’ का स्वरुप दे दिया है.
 
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एक अनुमान के मुताबिक करीब 88 प्रतिशत भारतीय महिलाएं माहवारी के दौरान सेनेटरी पेड का इस्तेमाल नही करती हैं. लेकिन वहीं दूसरी तरफ राजस्थान के एक छोटे से प्रखंड खेतड़ी के श्योलपुरा गांव की महिलाएं समाज में फैली इस रूढ़ि को तोड़नें का प्रयास कर मासिक धर्म की मानवतापूर्ण एवं वैज्ञानिक पक्ष को जन-जन तक पहुंचाने का काम कर रही हैं. इस काम में गांधी फैलो की टीम और आईआईटी दिल्ली के छात्रों का एक समूह  उनकी मदद कर रही है.
 
 
श्योलपुरा में इस काम को स्वयं सहायता समूह और विद्यालय प्रबंधन समिति की महिलाओं की एक टीम के द्वारा किया जा रहा है. सेनेटरी नैपकिन को आई.आई.टी के छात्रों द्वारा संचालित तितली प्रोजेक्ट के द्वारा प्रोवाइड किया जा रहा है. इस मुहिम के तहत ऐसे सेनेटरी नैपकिन बनाये जा रहे हैं जो किसी बाजार में उपलब्ध नैपकिन  से तीन गुणा बेहतर और किफाइती है.
 
इस सेनेटरी नैपकिन को स्वयं सहायता समूह 18 रुपये पैकेट के हिसाब से प्राप्त करती है. जिसे समूह के द्वारा तय राशि 25-26 रुपये के हिसाब से बेचा जा रहा है. इससे जहां एक ओर गांव की महिलाओं में जागरुकता बढ़ रही है वहीं दुसरी ओर कुछ हद तक समूह का आर्थिक पक्ष भी पूरा हो पा रहा है.
 
इस मुहिम में सक्रिय भूमिका निभानें वाली आंग्नवाड़ी सेविका विमला कहती है, ‘माहवारी के बारे में जागरुकता के आभाव में गांव की महिलाएं मासिक धर्म के दौरान कपड़े, रेत और राख का इस्तेमाल करती हैं, जो उनकी सेहत के लिए बेहद हानिकारक साबित हो रहा है.
 
 
श्योलपुरा की ही 20 वर्षीय अनिता का कहना है, ‘हमारे समाज में इस मुद्दे को लेकर महिलाएं अपने पति से भी बात नहीं कर पाती हैं. हमलोग किसी दुकान पर जाकर सेनेटरी नैपकिंस आसानी से नहीं खरीद पातीं. हमें बहुत ही संकोच के साथ अपनी आवश्यकता बतानी पड़ती है और सबसे छिपा कर उसे लाना होता है. लेकिन अब यह हमारे गांव में ही उपलब्ध है और हम लोगों में भी इसके इस्तेमाल को लेकर जागरुकता बढ़ी है.’
 
 इस मुहिम को लेकर गांधी फेलो स्निगधा ‘पीरियड’ पर बनी डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से समाज में मासिक धर्म से जुड़ी नकारात्मक अवधारणाओं को समाप्त करने का प्रयास कर रही है. इस सिलसिले में वह बताती  हैं, ‘हमारे समाज में महिलाओं की परवरिश इतने पर्दे में की जाती है कि वो अपने शरीर से पूरी तरह से वाकिफ ही नहीं हो पाती हैं जिसके चलते अगर महिलाओं को सैनेटरी नैपकिंस उपलब्ध हो भी जाते हैं तो संकोच के चलते इसके सही इस्तेमाल के बारे में जानने का प्रयास भी नहीं करतीं.
 
जिसका नतीजा, यह होता है कि वे परेशान रहती हैं और यही परेशानी अगली पीढ़ी को देती हैं. जिन कपड़ो का ये महावारी के समय इस्तेमाल करती है, उन्हें लोक-लाज के कारण खुले धुप मे नहीं सूखा पाती है. जिससे इनके शरीर को काफी नुक्कसान पहुंचता है.’
 
श्योलपूरा गांव की महिलाएं समाज में एक नयी पहल की शुरूआत कर रही हैं. घूंघट में लदी गांव की यह महिलाएं शहर में रहने वाले लोगों के लिये भी एक सबक बन रही हैं. अगर समाज में महिलाओं को इस महावारी जैसी ‘सोशल टैबू’ से बाहर नहीं निकाला गया तो इनका शारीरीक एवं मानसिक शोषण इन्हें कमजोर बनाती रहेगी.