नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा है कि ड्राइविंग लाइसेंस किसी की हत्या के लिए नहीं दिए जाते. कोर्ट ने यह टिप्पणी ग़ैर इरादतन हत्या के दोषी हरियाणा रोडवेज के ड्राईवर अमरीक सिंह की याचिका को ख़ारिज करते हुए की. साथ ही कोर्ट ने अमरीक को 6 महीने कि सज़ा भी सुनाई.
 
मामले की सुनवाई के दौरान हरियाणा रोडवेज के ड्राईवर की ओर से दलील दी गई थी कि हाई कोर्ट ने सजा की अवधि एक साल से घटाकर 6 महीने कर दी है और मुआवजा 30 हजार देने को कहा है. ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट चाहे तो सजा को खत्म कर मुआवजे कि राशि को बढ़ा दें.
 
इस दलिल पर नाराजगी जाहिर करते हुए कोर्ट ने कहा कि मुआवजा बढ़ाने से किसी की जिंदगी वापस नहीं मिल जाती. अगर हम मुआवजे कि राशि को बढ़ा दें तो क्या जिसकी मौत हो चुकी है वो फिर से जीवित हो जायेगा? कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को फटकार लगाते हुए कहा कि मौत केवल एक बार होती है क्या ये आप नहीं जानते?
 
बता दें कि पूरा मामला 18 दिसंबर 1995 का है. यमुना नगर डिपो कि हरियाणा रोडवेज कि बस का करनाल के इन्द्राणी रोड पर एक्सिडेंट हो गया था. उस समय बस को अमरीक सिंह चला रहे थे. उनके अनुसार बस का यू बोल्ट टूटने से बस पेड़ से टकरा कर पलट गई, जिसके कारण उसमें बैठे कई मुसाफिर जख्मी हुए और सुभाष चंद की मौत हो गई.
 
11 अगस्त 2005 को निचली अदालत ने ड्राईवर अमरीक सिंह को ग़ैर इरादतन हत्या का दोषी मानते हुए एक साल कि सज़ा सुनाई थी, जिसको उसने सेशन कोर्ट में चुनोती दी. सेशन ने 25 जनवरी 2006 को याचिका को ख़ारिज करते हुए एक साल की सज़ा पर मुहर लगाई. इस आदेश को अमरीक ने हाई कोर्ट में चुनोती दी थी. हाईकोर्ट ने थोड़ी राहत देते हुए अपने 1 अक्टूबर 2015 के आदेश में सज़ा को घटाकर 6 महीने कर दी लेकिन सुभाष चंद के परिवार को 30 हज़ार का मुआवजा देने के आदेश दिए थे, जिसे अमरीक ने सुप्रीम कोर्ट में चुनोती दी थी।