भुवनेश्वर. डॉ. अच्युत सामंत 25 हजार गरीब आदिवासी बच्‍चों को पांच सितारा माहौल में रखकर बिना किसी फीस के उनका भविष्‍य केजी से पीजी तक संवारते हैं. फिर आगे प्‍लेसमेंट का दरवाजा भी खोलते हैं. इस मिशन पर रोजाना करीब 50 लाख का खर्च आता है पर यह सामंत आज भी किराए के मकान में रहते हैं.

डॉ. अच्‍युत सामंत भुवनेश्‍वर स्थित कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (KISS) के चेयरपर्सन हैं. यह आवासीय स्‍कूल दुनिया का सबसे बड़ा आदिवासी स्कूल है जहां 25 हजार आदिवासी बच्चे अपना जीवन संवार रहे हैं. इन बच्चों में 62 आदिवासी समूहों के बच्चे हैं और ये सिर्फ उड़ीसा के नहीं बल्कि आस-पड़ोस के राज्यों के भी हैं. लड़का-लड़की के हिसाब से देखें तो 12248 लड़कियां और 12803 लड़के इस समय KISS में पढ़ रहे हैं.

125 बच्चों से शुरू हुआ था सफर, आज 25 हजार बच्चे पढ़ रहे हैं

सामंत ने जब KISS की शुरुआत की थी तब 125 आदिवासी बच्चों को यहां जगह दी गई थी और आज 25051 बच्चे इस आवासीय संस्थान में पढ़ रहे हैं. सामंत इन बच्चों को पहली क्लास से लेकर मैनेजमेंट तक की पढ़ाई करा रहे हैं और वो भी बिना किसी फीस के. उनका लक्ष्य है कि इस दशक के खत्म होते-होते वो KISS की दूसरे राज्यों में दस और शाखाएं खोलकर 2 लाख बच्चों को पढ़ा सकें.

रोजाना पचास लाख खर्च का हिसाब डा. सामंत का नहीं, मेरा है. सवाल उठता है कि इतने पैसे आते हैं कहां से क्‍योंकि सामंत ने अब तक कोई सरकारी अनुदान नहीं लिया है. दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम तो बार-बार ‘KISS’ के प्रयोग को देखने भुवनेश्‍वर जाते थे. दुनिया के कई देशों के दूतों ने भी भुवनेश्‍वर जाकर सामंत के अद्भूत जुनून को देखा है.

किसी बड़े घराने से नहीं हैं अच्युत सामंत पर काम बड़ा करते हैं

सामंत किसी बड़े घराने से नहीं हैं. अच्‍युत जब चार वर्ष के थे तो सात भाई-बहनों को छोड़ पिता चल बसे. सबसे छोटा भाई महीने भर का था. परिवार पर पहाड़ टूटा. मां ने सब्‍जी बेचना शुरू कर दिया. बच्‍चों की परवरिश की. कम उम्र से ही अच्‍युत मां का हाथ बंटाने को कमाने लगे और साथ में पढ़ाई भी जारी रखी. केमिस्‍ट्री में मास्‍टर डिग्री हासिल की. फिर कॉलेज में टीचर बन गए. पर मन नहीं रमा. जिद कुछ अलग और बड़ा करने की थी जिससे समाज में कुछ अच्छा हो.

सामंत ने 1992-1993 में पांच हजार रुपये की पूंजी से कलिंगा इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्‍नोलॉजी (KIIT) की स्‍थापना की. इसकी ख्‍याति तेज फैली और आज इसका 25 किलोमीटर का कैंपस है. कुल 22 इको फ्रेंडली बिल्डिंग हैं. सामंत ने माना है कि इस विकास में बिहार-झारखंड का बड़ा योगदान है. सिर्फ बिहार के करीब 16 हजार बच्‍चे KIIT से पढ़ कर निकल चुके हैं. 4500 बच्चे बिहार के आज भी यहां पढ़ रहे हैं. प्‍लेसमेंट का स्ट्राइक रेट सौ फीसदी है.

सामंत का इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ और बिजनेस कॉलेज भी है

सामंत का इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ, बिजनेस और दूसरे कॉलेज हैं. अपना बड़ा अस्‍पताल है. भारत के शैक्षिक संस्‍थानों में सबसे बड़ी लॉ लाइब्रेरी है. ‘KISS’ और ‘KIIT’ मिलाकर 10 हजार शैक्षणिक स्‍टाफ हैं. ‘KIIT’ को आज पूर्वी भारत का सबसे बड़ा विश्‍वविद्यालय माना जाता है. सामंत नहीं मानते लेकिन मेरी जानकारी में ‘KIIT’ पूर्वी भारत का सबसे मंहगा शैक्षिक संस्‍थान भी है.

सामंत कहते हैं कि जब ‘KIIT’ की गाड़ी चल पड़ी तो हमें अपने असली लक्ष्‍य का ख्‍याल आया. आदिवासी बच्‍चों की पीड़ा और गरीबी को हमसे बेहतर कौन जान सकता था. नक्‍सली बनते आदिवासी हमने देखे थे. तब हमने तय किया कि आदिवासी बच्‍चों में शिक्षा की लौ जलाएंगे. अपना जीवन ‘आर्ट आफ गिविंग’ के लिए समर्पित कर दिया और कलिंग इंस्‍टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (KISS) की स्‍थापना की. तब से सेवा का विस्‍तार बढ़ता ही जा रहा है.

कलिंगा कॉलेजों की कमाई आदिवासी बच्चों पर खर्च करते हैं अच्युत

आज पचीस हजार बच्‍चे हैं. आगे और बड़ा लक्ष्‍य है. कई प्रदेशों में विस्‍तार करना चाहते हैं. बिहार के मुख्‍यमंत्री और मुख्‍य सचिव से भी कहा है कि मुफ्त में जमीन दे दें तो हम भुवनेश्‍वर के ‘KISS’ जैसा संस्‍थान गरीब बच्‍चों के लिए खोल देंगे. वे कहते हैं कि जो पैसा ‘KIIT’ से आता है, वह हम ‘KISS’ पर खर्च कर देते हैं. ‘KIIT’ की प्रगति भी जारी है. ‘KISS’ के हॉस्‍टल मेस में प्रतिदिन करीब सात हजार किलो चावल पकता है. 17 सौ किलो सब्‍जी आती है. दाल-आटे का हिसाब अलग है. सबसे बड़ी बात यह है कि इन 25 हजार आदिवासी बच्‍चों में 60 प्रतिशत लड़कियां हैं.

‘KIIT’ की लोकप्रियता के बारे में सामंत कहते हैं कि हम इंट्रेस टेस्‍ट के लिए फीस नहीं लेते. कुछ साल पहले मालूम हुआ कि बिहार के गांवों में हमारे फॉर्म पैसे लेकर बेचे जा रहे हैं. फिर तहकीकात की तब मालूम हुआ कि बिहार में ‘KIIT’ में दाखिले को नौकरी की गारंटी मान लिया जाता है. एडमिशन के साथ ही शादी के रिश्ते आने शुरू हो जाते हैं और दहेज की मांग भी होने लगती है.

25000 बच्चों को सब कुछ मुफ्त देने के लिए ऐसे आता है KISS में पैसा

कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी यानी KIIT के तहत चलने वाले तमाम इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ, बिजनेस वगैरह के कॉलेजों के कुल टर्नओवर का 5 परसेंट सीधे KISS यानी कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज को जाता है. इससे सालाना करीब 39 करोड़ KISS को मिलते हैं. इसके अलावा KIIT के सारे स्टाफ अपनी सैलरी का 3 परसेंट KISS को देते हैं जिससे करीब 4 करोड़ जमा होता है.

KIIT का काम करने वाले कांट्रैक्टर और वेंडर अपनी कमाई का 2-3 परसेंट KISS को दान करते हैं जिससे लगभग 6 करोड़ जुटता है. दूसरे संगठनों, कॉरपोरेट और संपन्न लोगों के दान से करीब 15 करोड़ KISS में जमा होते हैं. KISS के बच्चों द्वारा तैयार सामान बेचकर 3 करोड़ के लगभग जुटाया जाता है.

10 दिसंबर को भुवनेश्वर में मानव श्रृंखला बनाएंगे संस्थान के 25 हजार बच्चे

सामंत को खुशी है कि ‘KISS’ से निकले आदिवासी बच्‍चे सभी क्षेत्रों में नाम कमा रहे हैं. ओलंपिक गेम तक की चयन प्रक्रिया से गुजरे हैं. 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस के अवसर पर ‘KISS’ के 25 हजार बच्‍चे भुवनेश्‍वर में मानव श्रृंखला बनाएंगे जो आदिवासी बच्‍चों का दुनिया में सबसे बड़ा ह्यूमन चेन होगा.

इतना सब कुछ बनाने और करने के बाद भी सामंत में कोई ठसक नहीं दिखी. भारत को ऐसे कई सामंत की जरुरत है. अविवाहित रहकर खुद किराए के मकान में रहे और 25 हजार आदिवासी बच्‍चों का जीवन संवारे, ऐसा उदाहरण भारत में और कहीं नहीं मिलता.

 

 

मुलाकात अच्‍युत सामंत से,आदिवासी बच्‍चों पर खर्च प्रतिदिन 50 लाख रुपये…

Posted by Gyaneshwar on Thursday, November 26, 2015