नई दिल्ली. भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का आज 35वां जन्मदिन है. भारतीय क्रिकेट के इतिहास के सबसे सुनहरे पन्ने लिखने वाले इस कप्तान ने साबित कर दिया कि उनकी कामयाबी महज तकदीर की मोहताज नहीं, बल्कि उनका बल्ला जब बोलता है, तो अच्छे-अच्छों का पसीने छूट जाते हैं.
 
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पर क्या आप जानते हैं कि बेस्ट गेम फिनिशर के नाम से जाने जानेवाले माही का सफ़र आसानी नहीं रहा. माही अपने स्कूल डीएवी विद्या मंदिर की फ़ुटबॉल टीम के गोलकीपर थे, जिन्हें आगे चलकर विकेट कीपिंग के लिए चुना गया. रांची से निकलकर 20 साल के माही खड़गपुर पहुंचे, जहाँ उन्होंने टिकट कलेक्टर का काम किया. 
 
इस दौरान धोनी रेलवे की तरफ़ से खेलते रहे. जहाँ उनके लम्बे शॉट्स की गूँज भारतीय टीम के चयनकर्ताओं तक पहुंची. और अंततः वे 2004 में भारतीय टीम का हिस्सा बने और 2005 में उन्हें टेस्ट क्रिकेट खेलने का मौका मिला. फिर क्या था, उन्होंने पीछे मुड़कर देखा ही नहीं.  क्रिकेट की दुनिया में कदम रखने के बाद उनकी रफ़्तार को कम करना किसी भी क्रिकेटर के लिए नामुमकिन था.
 
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2007 में बीसीसीआई ने 26 साल के धोनी को T20 की बागडोर सौंप कर दक्षिण अफ्रीका भेजा और माही ने इंडियन क्रिकेट टीम को विश्व चैम्पियन के रूप में दुनिया के सामने खड़ा कर दिया. माही का लोहा दुनिया ने माना जब उन्होंने 2011 वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में अपने हेलीकॉप्टर शॉट्स का कमाल दिखाकर भारत को वर्ल्ड कप जिताया. वो एक ऐसा क्षण था, जो आज तक लोगों के ज़हन में ताज़ा है.