नई दिल्ली: 32 साल पहले पाकिस्तान ने हिन्दुस्तान के खिलाफ एक बहुत बड़ी साजिश की थी लेकिन भारत के शूरवीरों ने दुश्मन सैनिकों को बर्फिस्तान में दफ्न कर दिया. पूरा देश जश्ने आजादी के उल्लास में डूबा है और सियाचिन ग्लेशियर में हमारे जांबाज जवान मौत के खतरे के सामने पूरी मुस्तैदी से डटे हुए हैं.
 
सियाचिन में तापमान माइनस 70डिग्री तक पहुंचा जाता. सियाचिन के युद्ध क्षेत्र में भारतीय फौज 1984 से तैनात है. सालभर यहां 10 हजार भारतीय जवान चौबीस घंटे तैनात रहते हैं. सियाचिन के शूरवीरों वतन की हिफाजत के लिए हंसते हंसते शहादत को गले लगा लेते हैं.
 
यहां के सैनिक दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र में पाकिस्तान के नापाक इरादों पर पानी फेरने में काफी महारत हासिल है. ऑपरेशन मेघदूत के महारथियों 32 सालों से हिंदुस्तान की सेना के सबसे बड़े पराक्रम और पाकिस्तान की सबसे बड़ी पराजय की मिसाल बनी हुई है.
 
आप जानकर हैरान होंगे कि जिस सियाचिन के चप्पे चप्पे पर आज हिंदुस्तान की सेना का पहरा है. वहां तीन दशक पहले तक न तो कोई सेना थी और न ही सैन्य साजो सामान पर 1984 में पाकिस्तान ने जब धोखे से सियाचिन को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की तो हमारे बहादुर सैनिकों ने उन्हें धूल चटाते हुए. इस पूरे इलाके को अपने अख्तियार में ले लिया.
 
आजादी की सालगिरह पर जब पूरा देश अपने वीर सपूतों को नमन कर रहा है तो इस मौके पर सियाचिन के उन शहीदों को भी श्रद्धांजलि दी जा रही है. जिन्होंने दुनिया के इस सबसे खतरनाक बैटल फील्ड में पाकिस्तान को पस्त कर दिया था.
 
लेकिन सियाचिन के शूरवीरों के लिए दुश्मनों का खतरा अभी भी खत्म नहीं हुआ है क्योंकि नापाक पाकिस्तान इस बर्फिस्तान में चीन की मदद से हिन्दुस्तान के खिलाफ लगातार साजिशें कर रहा है. यही वजह है कि सेना के जवान दिन हो या रात, आंधी हो या बरसात, हर वक्त हिमालय के मस्तक पर तैनात हैं.
 
ऊंचे ऊंचे पहाड़ों और गहरी खाई के बीच ये जवान चौबीसों घंटे किस तरह वतन की रखवाली में जुटे हैं. इतनी खड़ी बर्फीली पहाड़ी पर चढ़ना मौत को दावत देने जैसा है. जरा सा पैर फिसला नहीं कि जिंदगी पर ग्रहण लग सकता है लेकिन सेना के ये शूरवीर कैसे इस पहाड़ को भी पस्त करने में जुटे हैं.
 
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