नई दिल्ली. देश में बिजली की कमी दूर करने के लिए सरकार की नीयत और नीतियों में कितना तालमेल है, अब इस पर सरकार और बिजली उद्योग में चिंतन शुरू हो गया है. बिजली सेक्टर के जानकारों का कहना है कि सरकार की नीयत तो है कि सबको 24 घंटे बिजली मिले, लेकिन इसके लिए मौजूदा नीतियां कारगर नहीं हैं. बिना नीतियों में बदलाव किए बिजली संकट दूर कर पाना मुश्किल होगा. 
 
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इंडिया न्यूज़-IPPAI की पड़ताल
देश में बिजली की दशा और दिशा की पड़ताल करने के लिए ने इंडिपेंडेंस पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IPPAI) के साथ ‘उम्मीदों की रोशनी’ के नाम से सीरीज़ शुरू की है. IPPAI देश में ऊर्जा क्षेत्र की पहली थिंकटैंक है, जो 1994 से भारत में ऊर्जा क्षेत्र की सच्चाई पर खुली बहस के लिए निष्पक्ष मंच के रूप में काम कर रही है.
 
 
गोवा में मंथनः कैसे पूरी होगी बिजली की उम्मीद ?
देश की उम्मीदों और ज़मीनी सच्चाई की पड़ताल करने के लिए IPPAI ने गोवा में 22 सितंबर से 25 सितंबर तक रेगुलेटर्स एंड पॉलिसीमेकर्स रिट्रीट आयोजित किया, जिसमें केंद्रीय मंत्रियों, बिजली कंपनियों के उच्चाधिकारियों और ऊर्जा विशेषज्ञों ने बिजली सेक्टर के सामने पेश आ रही चुनौतियों पर चर्चा की. इस कार्यक्रम में केंद्रीय राजमार्ग और जहाज़रानी मंत्री नितिन गडकरी ने माना कि देश में बिजली और कोयले की कमी नहीं है, लेकिन बिजलीघरों तक कोयला पहुंचा पाना बड़ी चुनौती है. ट्रांसमिशन नेटवर्क की हालत ठीक नहीं है, जिससे बिजली उत्पादन का फायदा उपभोक्ताओं तक पूरी तरह नहीं पहुंच रहा.
 
 
बिजली का निजीकरण ही विकल्प?
IPPAI के गोवा रिट्रीट में शामिल बिजली उद्योग के दिग्गजों ने बताया कि पावर सेक्टर में पूंजी निवेश जितना होना चाहिए, उतना नहीं हो रहा. निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बिजली सेक्टर में सरकारी दखल कम करने की ज़रूरत है. उन्होंने दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और अहमदाबाद की मिसाल देते हुए कहा कि जिन शहरों में बिजली वितरण निजी कंपनियों के हवाले किया गया है, वहां बिजली सप्लाई में अभूतपूर्व सुधार हुआ है और लाइन लॉस की दर भी प्राइवेट डिस्कॉम में बहुत कम हुई है.