नई दिल्ली. देश में बिजली दशकों पुराना चुनावी मुद्दा रहा है. हर चुनाव में सभी पार्टियों के नेता गरीबों को सस्ती, किसानों को मुफ्त और बाकी लोगों को चौबीसों घंटे बिजली देने का वादा करते हैं. हर साल बिजली सब्सिडी के रूप में सरकारें अरबों रुपये खर्च करती हैं, लेकिन किसानों को वक्त पर बिजली नहीं मिलती और आम लोग बिजली बिल ज्यादा आने की शिकायत करते हैं. ऐसे में ये सवाल बड़ा है कि आखिर बिजली सब्सिडी से भला किसका हो रहा है?
 
इनख़बर से जुड़ें | एंड्रॉएड ऐप्प | फेसबुक | ट्विटर
 
देश में बिजली की दशा और दिशा की पड़ताल करने के लिए ने इंडिपेंडेंस पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IPPAI) के साथ ‘उम्मीदों की रोशनी’ के नाम से सीरीज शुरू की है, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं. IPPAI देश में ऊर्जा क्षेत्र की पहली थिंकटैंक है, जो 1994 से भारत में ऊर्जा क्षेत्र की सच्चाई पर खुली बहस के लिए निष्पक्ष मंच के रूप में काम कर रही है.
 
बिजली सब्सिडीः बोझ किस पर?
देश में बिजली की सब्सिडी को लेकर हमारी पड़ताल में खुलासा हुआ कि सरकारें बिजली सब्सिडी के नाम पर गरीबों और किसानों को राहत देने के जो वादे करती हैं, वो पूरे नहीं होते और सब्सिडी का बोझ औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को क्रॉस सब्सिडी के रूप में भुगतना पड़ता है.
 
उन्हें औसत से ज्यादा रेट से बिजली का बिल भरना पड़ता है. इसका असर भी आम लोगों पर ही होता है, क्योंकि इससे लोगों की जरूरत का ही सामान महंगा होता है. जानकारों का कहना है कि अगर सब्सिडी की बजाय किसानों को सोलर पंप जैसे विकल्प दिए जाएं या फिर गुजरात की तरह ज्योतिग्राम योजना पूरे देश में लागू हो तो जनता का ज्यादा भला होगा.