नई दिल्ली. देश की राजनीति में बिहार राज्य की अपनी एक अलग पहचान है. बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं की अपनी एक पहचान है, जिन्होंने अपराध की दुनिया से राजनीति में कदम रखा. और इस सूबे की सियासत को बदल कर रख दिया. बिहार में ऐसे कई नाम हैं लेकिन एक नाम ऐसा है जो सीवान से निकलकर पूरे बिहार में छा गया. वो नाम है मोहम्मद शहाबुद्दीन का.
 
कौन है मोहम्मद शहाबुद्दीन
शहाबुद्दीन एक ऐसा नाम है जिसे बिहार में हर कोई जानता है. मोहम्मद शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई 1967 को सीवान जिले के प्रतापपुर में हुआ था. उन्होंने अपनी शिक्षा दीक्षा बिहार से ही पूरी की थी. राजनीति में एमए और पीएचडी करने वाले शहाबुद्दीन ने हिना शहाब से शादी की थी. उनका एक बेटा और दो बेटी हैं. शहाबुद्दीन ने कॉलेज से ही अपराध और राजनीति की दुनिया में कदम रखा था. किसी फिल्मी किरदार से दिखने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन की कहानी भी फिल्मी सी लगती है. उन्होंने कुछ ही वर्षों में अपराध और राजनीति में काफी नाम कमाया.
 
अपराध की दुनिया से सियायत के गलियारे तक
अस्सी के दशक में शहाबुद्दीन का नाम पहली बार आपराधिक मामले में सामने आया था. 1986 में उनके खिलाफ पहला आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ था. इसके बाद उनके नाम एक के बाद एक कई आपराधिक मुकदमे लिखे गए. 
 
राजनीतिक गलियारों में शहाबुद्दीन का नाम उस वक्त चर्चाओं में आया जब शहाबुद्दीन ने लालू प्रसाद यादव की छत्रछाया में जनता दल की युवा इकाई में कदम रखा. पार्टी में आते ही शहाबुद्दीन को अपनी ताकत और दबंगई का फायदा मिला. पार्टी ने 1990 में विधान सभा का टिकट दिया. शहाबुद्दीन जीत गए.
 
उसके बाद फिर से 1995 में चुनाव जीता. इस दौरान कद और बढ़ गया. ताकत को देखते हुए पार्टी ने 1996 में उन्हें लोकसभा का टिकट दिया और शहाबुद्दीन की जीत हुई. 1997 में राष्ट्रीय जनता दल के गठन और लालू प्रसाद यादव की सरकार बन जाने से शहाबुद्दीन की ताकत बहुत बढ़ गई थी. 
 
आतंक का दूसरा नाम बन गए थे शहाबुद्दीन
2001 में राज्यों में सिविल लिबर्टीज के लिए पीपुल्स यूनियन की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि राजद सरकार कानूनी कार्रवाई के दौरान शहाबुद्दीन को संरक्षण दे रही थी. सरकार के संरक्षण में वह खुद ही कानून बन गए थे. शहाबुद्दीन का आतंक इस कदर था कि किसी ने भी उस दौर में उनके खिलाफ किसी भी मामले में गवाही देने की हिम्मत नहीं की. सीवान जिले को वह अपनी जागीर समझते थे. 
 
हत्या और अपहरण के मामले में हुई उम्रकैद
साल 2004 के चुनाव के बाद से शहाबुद्दीन का बुरा वक्त शुरू हो गया था. इस दौरान शहाबुद्दीन के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए. राजनीतिक रंजिश भी बढ़ रही थी. नवंबर 2005 में बिहार पुलिस की एक विशेष टीम ने दिल्ली में शहाबुद्दीन को उस वक्त दोबारा गिरफ्तार कर लिया था जब वह संसद सत्र में भागेदारी करने के लिए यहां आए हुए थे.
 
दरअसल उससे पहले ही सीवान के प्रतापपुर में एक पुलिस छापे के दौरान उनके पैतृक घर से कई अवैध आधुनिक हथियार, सेना के नाइट विजन डिवाइस और पाकिस्तानी शस्त्र फैक्ट्रियों में बने हथियार बरामद हुए थे. हत्या, अपहरण, बमबारी, अवैध हथियार रखने और जबरन वसूली करने के दर्जनों मामले शहाबुद्दीन पर हैं. अदालत ने शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा सुनाई थी.
 
बता दें कि जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर की हत्या का आरोप भी शाहबुद्दीन पर लगा. हाल हीं में बिहार के सिवान में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के मामले में भी शहाबुद्दीन का हाथ होने का अनुमान लगाया जा रहा है. ऐसे खलनायक समाज के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. इंडिया न्यूज के शो ‘खलनायक’ में देखिए शहाबुद्दीन की पूरी स्टोरी
 
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