नई दिल्ली. हिंदुस्तान का एक हिस्सा बूंद-बूंद पानी से लिए तड़प रहा है. चुल्लू भर पानी के लिए इंसान धरती को खोद रहा है. गांव के गांव सिर्फ एक नदी का पानी पीने को मजबूर हैं . 14 लाख की प्यासी आबादी का दर्द बहुत बड़ा है. 
 
प्यासे बांदा की एक-एक तस्वीर इंसान की आंखों में आंसू भर देता है. यकीन नहीं होता कि ये 21वीं सदी के हिंदस्तान की तस्वीर है. बांदा की ही एक बस्ती में हैंडपंप पर छुआछुत दिखता है. यहां की नदी में भी दंबंगों का दबदबा है. अवैध रेत खनन से कई गांवों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है.
 
बुंदेलखंड में बूंद बूंद के लिए जंग है, बूंद बूंद पानी में जिंदगी कैद है. नदी, तालाब, कुएं सब प्यासे हैं. हैंडपंप सूख चुके हैं. इंसान बूंद बूंद पानी के लिए तड़प रहा है. बांदा जिले के लोग गला तर करने के लिए मीलों चलते हैं. घंटे, दिन, महीने सब पानी ढोने में निकल जाते हैं. इंसानों और पशुओं के लिए ये एक मात्र उम्मीद की नदी है. ये दर्द है प्यास से कराहते, तड़पते बुंदेलखंड का, जो आंसू के शक्ल में छलक रहे हैं.
 
बुंदेलखंड में बिन पानी सब सून है. गेहूं, ज्वार, कपास उगाने वाली खेतों में दरारें पड़ी हैं. लगातार तीन साल से फटती खेतों को देख किसान दम तोड़ रहे हैं. कहते हैं कि पानी सबका है, सबके लिए है. लेकिन प्यास के कराहते बुंदेलखंड की नदी में माफिया राज है.
 
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