नई दिल्ली. हिंदुस्तान का एक हिस्सा आंसू पीने को मजबूर है. सूखते गले को कैसे तर करें, करीब 18 लाख आबादी दिन रात यही सोचती है. इसी के लिए चौबीसों घंटे जतन करती है. किसानों के घर अकाल पड़ा है. अन्नदाता के बच्चे दाने-दाने के लिए बिलख रहे हैं. चुल्लू भर पानी के लिए सूखी नदियां खोदी जा रही हैं. बीहड़ों को लांघकर सूखे गले को तर किया जा रहा है. पानी की तलाश अब इनकी जिंदगी बन गई है. 
 
मध्यप्रदेश की करीब 18 लाख की आबादी बूंद बूंद पानी के लिए तरस रही है. दर्द की ये स्याह कहानी सूखते, फटते और तड़पते छतरपुर की है. प्यासे छतरपुर में नाते रिश्ते मर रहे हैं. दरिया तो यहां सालों से सूखा है, लेकिन पानी के लिए खून के दरिया बह चले हैं. सगी बहन जानी दुश्मन बन जाती है.
 
छतरपुर में पानी के लगभग सभी स्रोत सूख चुके हैं. बुंदेलखंड में तीन साल से सूखा पड़ा है. बारिश के लिए लोग लोकगीत भी गा रहे हैं. छतरपुर कितनी प्यासी है? मड़ईयन गांव में हम इस सवाल का जवाब ढूंढ रहे थे. मड़ईयन गांव में एक स्कूल भी है लेकिन वहां 19 साल से पानी नहीं है.
 
इंडिया न्यूज के खास शो में देखिए क्यों बुंदेलखंड के जिले में छतरपुर बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है.    
 
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