काठमांडू. नेपाल में शनिवार को आए 7.9 तीव्रता वाले भूकंप के बाद दूसरी रात भी नेपालवासियों ने खुले में सोकर बिताई और इस बीच सोमवार तक मरने वालों की संख्या बढ़ कर 3,723 हो गई है, जबकि 6,313 लोग घायल हो गए हैं.  देश के गृह मंत्रालय के अनुसार, अकेले काठमांडू घाटी में 1,202 लोगों की मौत हुई है, तथा काठमांडू और आस-पास के इलाकों में कई ऐतिहासिक धार्मिक इमारतें ध्वस्त हो चुकी हैं.

एक अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि राहत केंद्रों पर शरण लेने वालों की संख्या ठीक-ठीक नहीं पता चल सकी है, लेकिन अनुमान के मुताबिक यह संख्या 20 लाख हो सकती है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिली मदद के बीच नेपाल के सैनिक पुलिसकर्मी तथा राहत एवं बचावकर्मी मलबे में दबे जीवित लोगों को बचाने और शवों को निकालने में जुटे हुए हैं.

नेपाल में 1934 के बाद आया यह सर्वाधिक विनाशकारी भूकंप है तथा शनिवार के बाद से बिजली की कमी के कारण राहत कार्य बाधित हुआ है. भूकंप में नेपाल यात्रा पर आए विदेशी पर्यटक भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. कैनबरा में अधिकारियों ने बताया कि नेपाल में अभी भी 300 आस्ट्रेलियाई नागरिक लापता हैं. नेपाल के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 70 में से 29 जिलों को संकटग्रस्त घोषित कर दिया है. पर्यटकों के लिए सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र काठमांडू घाटी सबसे बुरी तरह प्रभावित है.

भूकंप के कारण पूरे नेपाल में दूरसंचार व्यवस्था भी प्रभावित हुई है, जिससे फंसे विदेशी नागरिकों को अपने-अपने देशों में संपर्क करने में परेशानी हो रही है. काठमांडू में शनिवार को भूकंप आने के बाद से ही लोग खुले में शिविर लगाकर रह रहे हैं तथा धर्मादा संगठनों द्वारा आपूर्ति किए जा रहे भोजन पर निर्भर हैं. एक स्थानीय निवासी के शब्दों में काठमांडू किसी खुले विशाल शिविर की तरह हो गया है, लोग कंबलों, प्लास्टिक की चद्दरों और कार्डबोर्ड पर सोने के लिए मजबूर हैं. 

काठमांडू के एक निवासी ने पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर आईएएनएस से कहा, “मेरी छह महीने की बच्ची, सात वर्ष का बेटा और पत्नी रविवार से ही एक नजदीकी स्कूल में शरण लिए हुए हैं. मैं भी वही रह रहा हूं.” भूकंप के बाद आने वाले झटकों के डर से कुछ वाहन सड़कों पर यूं ही खड़े हैं. घरेलू उड़ानें रविवार तक के लिए रोक दी गई हैं. स्कूलों को पांच दिन के लिए तथा अदालतों को तीन दिन के लिए बंद घोषित कर दिया गया है. एक अधिकारी के अनुसार, काठमांडू घाटी में करीब 20 लाख लोगों ने स्कूलों एवं खुले मैदानों में शरण ली हुई है. सामाजिक संगठन उन्हें भोजन-पानी उपलब्ध करा रहे हैं.

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