बुंदेेलखंड. भूख और गरीबी का सबसे खौफनाक चेहरा बुंदेलखंड ने देखा है. आज भारत में जब बड़ी-बड़ी इमारतें, पक्की सड़कें और डिजीटल इंडिया की बात चल रही है वहीं बुंदेलखंड के लोग घास की रोटी खा रहे हैं. वो भी इसलिए क्योंकि विकास के दावों और तमाम वादों के बीच इन लोगों को पिछले कई साल से कुछ नहीं मिला. यहां भूख, बदहाली और कर्ज़ फैला हुआ है.
 
बुंदेलखंड में कुल 13 जिले हैं. सात जिले उत्तर प्रदेश में और 6 मध्य प्रदेश में हैं. आबादी की बात की जाए तो बुंदेलखंड की कुल आबादी करीब 1 करोड़ 80 लाख है. एक सर्वे के मुताबिक, पिछले आठ महीनों में यहां के 53 फीसदी परिवारों ने दाल नहीं खाया.
 
69 फीसदी लोगों ने पिछले 8 महीनों में दूध का मुंह नहीं देखा और 17 फीसदी परिवारों ने माना कि वो घास की रोटी बनाकर खाते हैं.  वो घास जिसे यहां के लोग ‘फिकार’ कहते हैं यानी बुंदेलखंड के करीब 30 लाख लोग घास की रोटी के सहारे ज़िंदा हैं. यहां 35 साल से पानी नहीं आया. सर्वे कहता है कि 27 फीसदी लोगों ने या तो अपनी ज़मीन बेच दी या फिर गिरवी रखी है.  40 फीसदी लोगों ने अपने पशु बेच दिए हैं.
 
बुंदेलखंड में किसानों के लिए एक नहीं, कई मुसीबत है. पहला- पानी ना आना, दूसरा- खनन से उड़ने वाली धूल. लेकिन सबसे बड़ी मार कर्ज़ की पड़ती है जिसकी वजह से किसान की कमर टूट जाती है. दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना उसके लिए मुश्किल हो जाता है.
 
जालौन के किसान सुरेश सिंह को ही लीजिए जिनकी खेती-खलिहानी तबाह हो गई. घर कर्ज़ में डूब गया तो ज़िंदगी ने भी सुरेश से मुंह मोड़ लिया. सुरेश सिंह का एक बेटा है. एक बेटी है लेकिन कर्ज़ इतना है कि इन्हें ज़िंदगी पहाड़ जैसी लग रही है.
 
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