उफा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स के सदस्य देशों की बैठक व शंघाई सहयोग शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए आज तीन दिवसीय यात्रा पर रूस के उफा शहर पहुंच गये हैं. अब से थोडी देर बाद वहां औपचारिक बैठकों का दौर शुरू होने वाला है. इस दौरान भारत या एशिया फोकस्ड मीडिया के लिए एक अहम सुर्खी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से द्विपक्षीय मुलाकात हो सकती है. इंडिया न्यूज़ के एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया रूस के उफ़ा से आपको बता रहे हैं इस यात्रा के मायने.

आपको बता दें कि दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अहम चिंता यह है कि कैसे वे अपनी अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करें और उनकी साझी अर्थव्यवस्था का एक स्वतंत्र और मजबूत अस्तित्व हो, जो विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की जकडन से मुक्त हो. इस चिंता के पीछे ठोस आधार भी है. ब्रिक्स के सदस्य देश ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका दुनिया की लगभग आधी यानी तीन अरब लोगों को प्रतिनिधित्व करते हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में चार खरब डॉलर का योगदान करते हैं.
 
अबतक वैश्विक अर्थव्यवस्था की मुद्रा डॉलर ही है. अंतरराष्ट्रीय कारोबार इसी के माध्यम से होता है. लेकिन, इस बार ब्रिक्स की बैठक में स्थानीय मुद्रा में कारोबार की संभावनाओं की तलाश की जायेगी. उल्लेखनीय है कि ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक की स्थापना हो चुकी है और भारतीय बैंकर केवी कॉमथ उसके अध्यक्ष बनाये गये हैं.
 
ब्रिक्स के गठन से अबतक कितनी बदली है दुनिया?
उभरती अर्थव्यवस्थाओं के संगठन ब्रिक्स की प्रासंगिकता काफी बढ गयी है. यह प्रासंगिकता इस कारण सहज ही बढ जाती है कि इसके सदस्य दुनिया की दो सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था चीन व भारत हैं. इस संगठन को पश्चिमी प्रभाव से बचाना भी एक चुनौती है और यह भी आवश्यक कि पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक टकराव को रोका जाये. ब्रिक्स का सदस्य रूस अबतक जी आठ यानी दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के संगठन का सदस्य था, लेकिन यूक्रेन संकट के कारण उसे इस संगठन से बाहर कर दिया गया है. इसके चलते व अपनी आर्थिक मजबूरियों के कारण रूस के लिए भी अब यह संगठन अधिक अहम हो गया है. उसके लिए पश्चिमी दुनिया में अब सीमित विकल्प हैं. जाहिर है, उसे प्रो एशिया रुख अख्तियार करना होगा. बदलते आर्थिक हालात में रूस व चीन भी अब करीब आ रहे हैं. 
 
उधर, चीन के द्वारा स्थापित किये गये एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर बैंक में चीन के बाद भारत व रूस सबसे बडे हिस्सेदार हैं. दुनिया के ज्यादातर देश इसके सदस्य बन रहे हैं. इसमें अपवाद रूस है. अमेरिका इससे खिन्न भी है. लेकिन, अमेरिकी प्रभाव वाले विश्व बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रभाव से बाहर निकलने के लिए दुनिया के देश ब्रिक्स बैंक और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड इनवेस्टमेंट बैंक में रुचि ले रहे हैं और उससे जुड रहे हैं. इससे ढांचागत विकास से सदस्य देशों को सीधा लाभ होगा. ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में यूरोपीय संघ, ग्रीस संकट जैसे मुद्दों व उसके असर पर भी चर्चा हो सकती है.
 
एससीओ में भारत की सदस्यता का सवाल
 शंघाई कॉपरेशन ऑरगेनाइजेशन संगठन की भी इस दौरान नौ व दस जुलाई को बैठक है. फिलहाल चीन, रूस, कजाकिस्तान, केरिगिस्तान, उजबेकिस्तान व तजाकिस्तान इसके सदस्य हैं. भारत इसमें सदस्यता के लिए प्रतीक्षारत है. रूस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि भारत को अगले साल तक इस संगठन की सदस्यता मिल सकती है. मुख्य रूप से एशिया केंद्रित यह संगठन इसके सदस्य देशों द्वारा आतंकवाद, अलगाववाद व अतिवाद का सामना करने के लिए स्थापित किया गया. हालांकि पश्चिमी मीडिया इस संगठन को एशियाई देशों का नाटो के विकल्प का प्रयास के रूप में देखता है. पर, इसके सदस्य देश आपसी सैन्य सहयोग के माध्यम से अपनी सीमाई व आतंरिक सुरक्षा को मजबूत करते हैं. 

भारत को इसकी सदस्यता मिल जाने पर इसका लाभ यह होगा कि वह इसके एक सदस्य के रूप में आतंकवाद व अलगाववाद के खिलाफ इसके सदस्य देशों के साथ अधिक संगठित होकर लड सकेगा. भारत 2005 से ही इस संगठन का एक ऑब्जर्वर है और पिछले साल इसकी सदस्यता के लिए आवेदन किया है. पाकिस्तान भी इसका सदस्य बनने के लिए प्रयासरत है और उम्मीद है कि उसे भी अगले साल तक इसमें सदस्यता मिल जायेगी. पाकिस्तान के इसके सदस्य बनने पर भारत को इसका लाभ इस रूप में होगा कि उसकी मजबूरी हो जायेगी कि वह अधिक जिम्मेवार राष्ट्र की भूमिका अदा करे. रूस के राष्ट्रपति के सहायक यूरी उसाकोव ने भी कहा है कि अगले साल एससीओ के सदस्य देशों की बैठक में इसमें भारत पाकिस्तान को शामिल करने पर निर्णय लिया जायेगा.

IANS इनपुट भी