विशाखापट्टनम. देश में बेरोजगारी के खतरनाक स्तर पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने काम करने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने और बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देने की मांग की है. पार्टी के 21वें अधिवेशन में शुक्रवार को एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कहा गया है कि अत्यधिक बेरोजगारी आर्थिक सुधार के 30 से अधिक वर्षो का परिणाम रहा है, जो लाखों भारतीय युवकों के भविष्य के लिए खतरा है.

प्रस्ताव में केंद्रीय और राज्य सरकार के विभिन्न विभागों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में नियुक्ति पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग की गई है. इसके साथ ही इसने रिक्त पदों को समाप्त करने पर रोक लगाने तथा नियत समय सीमा के अंदर इन पदों को भरने की मांग की गई है. प्रस्ताव में सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में नौकरियों की आउटसोर्सिग रोकने की भी मांग की गई है.

नौकरियों का सृजन सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की जगह सरकार पूरी तरह संगठित निजी क्षेत्र, घरेलू व विदेशी कॉरपोरेट के निवेश के जरिए भारत में रोजगार सृजन पर भरोसा कर रही है: माकपा

प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की समान नीतियों ने भी रोजगार के अवसर पैदा नहीं किए, बल्कि स्थितियां और खराब हुईं. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) पर अपने एक अन्य प्रस्ताव में पार्टी ने मोदी सरकार की नीतियों की निंदा करते हुए कहा कि इसने ग्रामीण भारत में 100 दिनों के काम करने के कानूनी अधिकार को कमजोर किया है या फिर इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया है. प्रस्ताव में कहा गया है कि तमाम कमजोरियों के बावजूद मनरेगा का ग्रामीण रोजगार और मजदूरी में सकारात्मक प्रभाव रहा है.