नई दिल्ली: उठाओ लुंगी, बजाओ पुंगी… शिवसेना का पहला नारा, जिसने एकदम से मराठी युवाओं को उस पार्टी की तरफ खींच लिया था. महाराष्ट्र के गठन के बाद जब बाल ठाकरे ने मुंबई में साउथ इंडियंस के खिलाफ मोर्चा खोला तो ये नारा दिया था. बाद में उन्होंने अपनी लड़ाई को साउथ इंडियंस से हटाकर वामपंथी पार्टियों की तरफ मोड़ दिया था.
 
शायद लैफ्ट पार्टियां ही अकेली ऐसी राजनीतिक ताकत रही है, जिसके प्रति ठाकरे हमेशा गरम ही रहे, कभी नरमी नहीं दिखाई और जरूरत भी नहीं पड़ी क्योंकि लैफ्ट पॉवर बाल ठाकरे के पहले दाव से ही इतना ज्यादा चित हो गया था कि वो उठ नहीं पाया. लेकिन जो भी ताकतवर पार्टी महाराष्ट्र या मुंबई में ताकतवर रहती है, उससे शिवसेना के रिश्ते कभी नरम तो कभी गरम होते ही रहे हैं, ताजा केस बीजेपी का है.
 
विंद
 
बाला साहेब ठाकरे के पिता केशव सीताराम ठाकरे जिन्हें प्रबोधन ठाकरे के नाम से ज्यादा जाना जाता था, को श्रेय जाता है बाल ठाकरे के अंदर पॉलटिकल एक्टिविज्म लाने का. जब संयुक्त महाराष्ट्र समिति बनी तो उसके प्रमुख नेताओं में थे वो, बाल ठाकरे उनसे काफी सीखते थे. ऐसे में बाल ठाकरे की प्रतिभा देखकर उनके पिता उनसे रोज एक कार्टून बनवाते थे, बाद में वो फ्री प्रेस जनरल के लिए बनाने लगे. बाद में बाला साहेब ने अपना खुद का साप्ताहिक ‘मार्मिक’ शुरू कर दिया, जिसमें कार्टून बनाने लगे.
 
मार्मिक में एक खास कौना हर बार छपता था, जिसमें मुंबई की कॉरपोरेट वर्ल्ड की किसी ना किसी कंपनी में काम करने वाले अधिकारियों की लिस्ट हर बार छपती थी कि कैसे उस कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर से लेकर असिस्टेंट मैनेजर तक की पोस्ट पर साउथ इंडियन है और चपरासी की पोस्ट पर कोई महाराष्ट्रियन है. घीरे धीरे ऐसी रिपोर्टस ने कमाल करना शुरू कर दिया, मराठी एकजुट होने लगे.
 
 
मार्मिक के दफ्तर के सामने बेरोजगार मराठियों की फौज इकट्ठा होने लगी, ठाकरे उनकी लिस्ट बनाकर नौकरी के प्रयास भी करने लगे. इधर पिता ने सलाह दी कि संगठन बनाना पड़ेगा, 19 जून 1966 को शिवसेना बनी, 30 अक्टूबर 1966 को जब उन्होंने पहली रैली के लिए शिवाजी पार्क बुक किया तो दोस्तों ने मना किया कि इतनी बड़ी जगह है, मैदान खाली दिखा तो मीडिया मजाक बनाएगी. लेकिन हुआ ठीक उलटा, मैदान छोटा पड़ गया.
 
बाल ठाकरे का उत्साह का तो कोई ठिकाना ही नहीं था. उन्होंने भारतीय कामगार सेना बना डाली, जिसके जरिए मराठी युवाओं के लिए कंपनियों में नौकरी के लिए दवाब बनाया जाने लगा. साउथ इंडियंस के रेस्टोरेंट्स को निशाना बनाया जाने लगा. इतना खौफ था लोगों में कि बाल ठाकरे के सगे साले और उद्धव के मामा को एक साउथ इंडियन लड़की से शादी की इजाजत तक बाल ठाकरे से मांगनी पड़ी.
 
 
इधर चेन्नई में एक बॉलीवुड फिल्म को रिलीज नहीं होने दिया गया तो शिव सैनिकों ने लालबाग के गणेश टॉकीज में एक साउथ इंडियन प्रोडयूसर की फिल्म पर हमला बोल दिया, हॉल तोड़फोड़ दिया गया, चेन्नई में बॉलीवुड फिल्म पर से बैन वापस ले लिया गया. यहीं से बॉलीवुड के लोग बाल ठाकरे के नजदीक आने लगे, उनको ठाकरे की बढ़ती ताकत का अनुमान था, दिलीप कुमार उनके टैरेस पर चने के साथ बीयर पीते थे, तो मिथुन डैडी बोलते थे, अमिताभ बड़े भाई की तरह मानते थे.
 
लेकिन ठाकरे को अंदाज था कि साउथ इंडियंस के खिलाफ कैम्पेन एक हद तक जायज था, इसलिए उन्होंने उस गुस्से को लैफ्ट पार्टीज की तरफ मोड़ दिया, साउथ इंडियंस पर वो नरम हो गए. यहां तक कि 1971 में उन्होंने जनरल करियप्पा को सपोर्ट भी किया था.
 
 
 
उन दिनों सारी मजदूर यूनियंस पर लैफ्ट पार्टीज का कब्जा था, हर जगह लाल झंडा फहराता था. शिवसेना ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया, हद तो तब हो गई जब एक दिन शिवसैनिकों ने कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर पर धावा बोल दिया, जो परेल की दलवी बिल्डिंग में था. शिवसेना का नया नारा था-लाल झंडे को आग लगाओ. शिवसेना का दबदबा सारी फैक्ट्रियों में कायम हो गया, अब हड़ताल करवाने से लेकर तुड़वाने तक की सारी ताकत ठाकरे के हाथ में थी.  1967 में ठाणे में पहली बार शिवसेना ने म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन का चुनाव लड़ा तो चालीस में से 15 सीटें मिलीं, एक साल के अंदर ही नतीजे चौंकाने वाले थे, और शिवसेना के लिए जोश से लबरेज भी.
 
अब शिवसेना अपना आधार बढ़ाना चाहती थी, इसके लिए दूसरी पॉलटिकल पार्टियों से हाथ मिलाना जरूरी था. ऐसे में पहला गठबंधन मधु तंडवते की पार्टी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से किया गया, दोनों ने मिलकर बीएमसी का चुनाव लड़ा और शिवसेना कांग्रेस के बाद बीएमसी में दूसरे नंबर पर आ गई. लेकिन यूनियन की राजनीति में दखल देने का नतीजा ये रहा कि कई पॉलटिकल मर्डर भी हुए और ऐसे में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और शिवसेना का गठबंधन बहुत जल्द टूट गया. इधर ठाकरे एक फैसला कर चुके थे, वो मराठी अस्मिता को थोड़ा वृहद रूप देना चाहते थे तो शिवसेना को हिंदूवादी इमेज में ढाला गया, जिसको राष्ट्रवाद से जोड़ना आसाना था.
 
 
1970 में भिवंडी के दंगों में शिवसेना का नाम आया, ऐसे में बीच बीचे में ठाकरे के बयान आग को और भड़का देते थे, जैसे- हम लोकशाही को नहीं ठोकशाही को मानते हैं. ऐसे में उन्होंने 1975 की इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी और संजय गांधी दोनों की तारीफ की. कांग्रेस से गुपचुप हाथ भी मिलाया, कई मौकों पर उनको सपोर्ट भी किया. शिवसेना की दशहरा रैली में कांग्रेस नेता शरद पवार और लोकदल के नेता जॉर्ज फर्नाडींस शिवसेना के मंच पर दिखे.
 
लेकिन कांग्रेस शिवसेना की इमेज देखते हुए उसके साथ विधानसभा चुनावों में टाईअप करने से बचती रही. हालांकि ठाकरे अपने राजनैतिक दूरदर्शिता का इस कदर दावा करते थे कि 1980 में ही इंदिरा गांधी की हत्या की बात और लिट्टे के हाथों राजीव गांधी की हत्या की बात उन्होंने पहले से ही अनुमान लगा ली थी. इधर कर्नाटक के मराठी भाषी इलाकों को महाराष्ट्र में शामिल करने का आंदोलन शिवसेना ने छेड़ दिया, विवाद बढ़ा तो ठाकरे और मनोहर जोशी दोनों को जेल भेज दिया गया। लेकिन उससे आग और भड़क गई, पूरा महाराष्ट्र जलने लगा.
 
कांग्रेस के सीएम ने जेल में जाकर ठाकरे से गुजारिश की कि वो अपने लोगों से ये सब रोकने की अपील करें. लेकिन ठाकरे को जमानत मिलते तक महाराष्ट्र जलता रहा. मुसीबत की परिस्थितियों में ठाकरे की ताकत और बढ़ जाती थी. मीडिया में शिवसेना का विरोध देखकर बाल ठाकरे हमेशा कहते थे कि वहां लैफ्टिस्ट भरे पड़े हैं, ऐसे में उन्होंने शिवसेना का पेपर सामना शुरू करने की योजना बनाई और सामना के आने के बाद बाल ठाकरे को अपने फॉलोअर्स तक अपनी बात पहुंचाना आसान हो गया.
 
1989 में शिवसेना के चार एमपी चुनकर आने से ताकत बढ़ गई, उसी साल शिवसेना ने अपने इरादों के पंख फैलाते हुए उस वक्त प्रमुख विपक्षी भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिला लिया. प्रमोद महाजन को इसका क्रेडिट जाता है, जो ठाकरे की ईगो को सैटिस्फाई करने में कामयाब रहे थे. हालांकि शिवसेना की शाखा पद्धति विकसित करने की प्रेरणा बाल ठाकरे को संघ से ही मिली थी.
 
दोनों पार्टियों के मिलने का तत्तकालीन मकसद था राम जन्मभूमि आंदोलन और शिवसेना ताल ठोककर बाबरी ढांचे को तोड़ने का श्रेय लेती रही, बीजेपी बचती रही. इधर शिवसेना में राज ठाकरे का उभार होने लगा था, चाचा ठाकरे की तरह कार्टूनिंग करते थे और उन्हीं के अंदाज में तेजतर्रार भाषण भी देते थे. ऐसे में ठाकरे ने एक ऐसी चाल चल दी, जिनका उन्हें नुकसान ये हुआ कि एक दो मजबूत नेता पार्टी छोड़ गए.
 
दरअसल मंडल आयोग की सिफारिशों का बीजेपी भी विरोध करने से बच रही थी और मंडल के जवाब में कमंडल यानी राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू कर दिया था, लेकिन ठाकरे ने मंडल की सिफारिशों का विरोध करना शुरू कर दिया. बिना ये समझे कि शिवसेना का 70 फीसदी आधार महाराष्ट्र का पिछड़ा वर्ग ही है. छगन भुजबल ने वीपी सिंह के समर्थन में बयान दिया और बाद में पार्टी छोड़ गए. 1992 में शिवसेना बीएमसी भी हार गई.
 
लेकिन उसी साल बाबरी ढांचा टूटने के बाद हुए दंगों, 1993 में बम विस्फोट के बाद हुए दंगों में शिवसेना एक नए रूप में खड़ी हो गई. मराठियों और नॉन मुसलमानों के बीच मसीहा की तरह खड़ी हो गई शिवसेना. सामना में धमाकों के बाद ठाकरे के एक उत्तेजनात्मक लेख के बाद ठाकरे को गिरफ्तार कर लिया गया, और जब तक वो बाहर नहीं आए मुंबई जलती रही.
 
बाद में किसी ने ठाकरे से इंटरव्यू में पूछा भी कि आप मानते हैं कि दंगों में शिवसेना का हाथ है? तो उनका जवाब था कि हाथ नहीं पांव है. उनको पता था कि उनको फॉलोअर्स को यही जवाब रास आएगा. उन्होंने ये भी कहा कि हम मार खाने और मरने के लिए पैदा नहीं हुए हैं, छेड़ोगे तो छोड़ेंगे नहीं, बम फोड़ोगे तो हम चुपचाप नहीं बैठेंगे. शिवसैनिकों ने सड़कों पर सामूहिक नमाज की तर्ज पर सड़कों पर महाआरती करना शुरू कर दिया.
 
शिवसेना का फिर से उभार हुआ और 1995 में बीजेपी की मदद से महाराष्ट्र की गद्दी शिवसेना के हाथ आ गई। मनोहर जोशी सीएम बने लेकिन बाद में करप्शन चार्जेज के बाद ठाकरे ने उनको हटाकर नारायण राणे को सीएम बना दिया. हालांकि इधर बड़े बेटे माधव की एक्सीडेंट में मौत और मझले जयदेव की अरुचि के चलते छोटे बेटे उद्धव और भतीजे राज ठाकरे की निगाह भी सीएम की कुर्सी पर लगी थीं.
 
राज ने अपना अभियान थोड़ा तेज किया, 1996 में जब बाल ठाकरे ने माइकिल जैक्सन को शो के लिए मुंबई में बुलाया तो पूरे ईवेंट के आयोजन की जिम्मेदारी राज ठाकरे के सर पर थी। जैक्सन ठाकरे को अपना हैट तोहफे में देकर गए. 1998 में राज ने फिर एक बड़ा आयोजन किया, लता मंगेशकर कंसर्ट, अब उद्धव ठाकरे कैम्प को राज की इस तेजी और बढ़ते प्रभाव से समस्या होने ली थी, उद्धव तब सामना की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, और शिवसैनिकों के बीच सौम्य छवि वाले फोटोग्राफर के तौर पर जाने जाते थे.
 
जब जयदेव की पत्नी स्मिता ठाकरे बाल ठाकरे के साथ कई फंक्शन में नजर आईं तो उद्धव फॉर्म में आ गए, पहले मातोश्री और फिर पार्टी के मामलों में दखल देने लगे. बाला साहेब अब बूढ़े होने लगे थे. धीरे धीरे वो अपनी कुर्सी और कमरे तक ही सिमट कर रह गए और उद्धव ने धीरे धीरे राज के करीबियों को किनारे करना शुरू कर दिया. 2002 को बीएमसी चुनावों में राज के कई करीबियों की टिकटें कट गईं, राज खामोश रहे, कई बार चाचा ठाकरे को कहा भी, एक बार उसी साल वो एक पब्लिक फंक्शन में भड़के भी, लेकिन फिर खामोश हो गए.
 
लेकिन 2002 में बीएमसी में मिली जीत ने उद्धव का दावा और मजबूत कर दिया. 2003 के महाबलेश्वर अधिवेशन में बाल ठाकरे की गैर मौजूदगी में उद्धव ने बडा काम किया, राज ठाकरे से ही अपने लिए कार्यकारी अध्यक्ष का प्रस्ताव दिलवाया. बाद में राज ने कहा भी था कि – उस दिन मैंने अपने हाथों से अपने पैरों पर पत्थर मार लिया था. 2004 के विधानसभा चुनावों में शिवसेना हार गई, नारायण राणे ने बाल ठाकरे पर अपने बेटे को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया. राज ने इंतजार किया, शायद इस हार के बाद कमान उन्हें सोंपी जाए, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं.
 
अगले साल यानी 2005 में अब तक खामोश बैठे राज ने शिवसेना छोड़ने का ऐलान कर दिया, पहली बार कोई ठाकरे परिवार का बंदा शिवसेना छोड़ रहा था. 27 नवंबर 2005 को राज ठाकरे ने उसी शिवाजी पार्क को अपनी नई पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के ऐलान के लिए चुना, जिसको कभी बाल ठाकरे ने शिवसेना के लिए चुना था. बाल ठाकरे ने सामना में गुस्से में लिखा कि शिवसेना किसी की जागीर नहीं, हालांकि उनको लगता था कि राज एक दिन लौट आएगा.
 
राज ने बाल ठाकरे की तरह ही मराठी अस्मिता को मुद्दा बनाया और साउथ इंडियंस की बजाय नॉर्थ इंडियंस को निशाना बनाय़ा. राज को शुरूआती कामयाबी भी मिली, लेकिन राज भूल चुके थे कि ना तो वो 1966 वाले महाराष्ट्र या मुंबई थी, जिसमें किसी एक वर्ग की नौकरी में बपौती थी, ना नॉर्थ इंडियंस क्रीम पदों पर काबिज थे, ज्यादातर ऑटो रिक्शा चलाते हैं और ना ही मीडिया या कानून के सिपाही अब इतने कमजोर थे. फिर भी 2009 के चुनावों में शिवसेना एक बार फिर सत्ता से दूर ही रही बल्कि चौथे स्थान पर आ गई और एमएनएस 13 सीटों पर जीत गई. इधर राज ठाकरे पर देश भर में कई केस फाइल हो गए, देश भर के लिए वो विलेन बन गए.
 
2010 में उद्धव ने पहली बार अपने बेटे के साथ अपने पिता को मंच पर उतारा, यानी दशहरा की रैली में तीन पीढियां एक साथ, आदित्य को युवा सेना का अध्यक्ष बना दिया गया. उद्धव का राज के लिए इशारा साफ था. 2012 के बीएमसी चुनाव बीजेपी शिवसेना मे मिलकर जीता लेकिन 28 सीट्स एमएनएस के पास थीं और 56 जगह वो दूसरे स्थान पर रहीं. जबकि उद्धव ने 2012 की दशहरा रैली में बाल ठाकरे का वीडियो स्टेटमेंट रिकॉर्ड करके दिखाया था.
 
बाल ठाकरे की उसी साल मौत हो गई, एक बार फिर नजदीक आए राज ठाकरे. कई मौकों पर वो परिवार समेत मौजूद थे, उद्धव बीमार हुए तो वो हॉस्पिटल पहुंचे और खुद कार चलाकर उन्हें छोडऩे आए. राज और उद्धव के मिलने के कयास लगने लगे. लेकिन उद्धव ऐसे किसी भी कयास को परवान चढ़ते देखना नहीं चाहते थे, उनसे बेहतर राज की महत्वाकांक्षी को कोई नहीं समझ सकता था. धीरे धीरे राज भी समझ गए थे उद्धव का मूड.
 
लेकिन एमएनएस का सही मायने में खेल खराब किया उनके तथाकथित दोस्त मोदी ने, 2014 के लोकसभा चुनावों के साथ साथ विधानसभा चुनाव हुए. शिवसेना की अपने इतने पुराने साथी बीजेपी से भी बिगड़ गई, बीजेपी मोदी की लहर के चलते कॉन्फीडेंस से लबालब थी, बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी, आधे पर सिमट गई शिवसेना और बिखर गया उध्दव का सीएम बनने का ख्वाब भी, लेकिन एक खुशी उद्धव को मिली वो ये कि एमएनएस खत्म ही हो गई. केवल एक सीट पर जीत पाई एमएनएस.
 
शिवसेना और बीजेपी की आपसी लड़ाई खत्म हो गई और ऐसे ही कुछ नतीजे बीएमसी के चुनावों में आए, मराठी अस्मिता की बात आई तो मराठियों ने शिवसेना को सपोर्ट किया और 84 सीटें दीं और नॉन मराठी हिंदुओं की पहली पसंद बीजेपी बनीं और 82 सीटें मिलीं जबकि एमएनएस के पास ना मराठी मुद्दा रहा और ना कोर हिंदू वोट, बमुश्किल सात सीटों ही जीत पाई.
 
ऐसे में भले ही बीजेपी से रार के तमाम नुकसान शिवसेना को हुए हों जैसे हिंदुत्व का मुद्दा छिन जाना, लेकिन मराठी अस्मिता के अकेले लंबरदार के तौर पर उभरे हैं उद्धव और राज ठाकरे का दावा इस मामले में बुरी तरह से फेल हो गया, हालांकि बाद में बीजेपी ने बिना शर्त बीएमसी में शिवसेना को समर्थन दे दिया, अब राष्ट्रपति चुनाव में फिर कहीं पेच ना फंसे. बीजेपी के साथ उद्धव फिर से रिश्ते कैसे नरम करके ये ऊहापोह खत्म करेंगे, या देखने वाली बात होगी, या फिर उनको इस ऊहापोह में ही राजनीतिक फायदा नजर आता है, तो ये अलग बात है.