नई दिल्ली. यूपी में बीजेपी के दयाशंकर सिंह ने मायावती को गाली क्या दी, बीजेपी के बड़े-बड़े नेता अब गाल पर हाथ रखकर चिंता में हैं. अंदेशा है कि कहीं बिहार में संघ प्रमुख की तरह यूपी में दयाशंकर ने भी तो ‘भागवत कथा’ नहीं दोहरा दी? बीएसपी के कार्यकर्ता यूपी में हुंकार भर रहे हैं और बीजेपी के पास सफाई देने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं.
 
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मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाने के चक्कर में दयाशंकर सिंह उनकी तुलना वेश्या से कर गए. मायावती पर टिकट बेचने के आरोप में कुछ भी नया नहीं था, लेकिन अपनी बात का वज़न बढ़ाने के चक्कर में दयाशंकर ने बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष की हैसियत से जितने हल्के, भद्दे और असभ्य शब्द का इस्तेमाल किया, उससे बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व को भी शर्मसार होना पड़ा. 
 
दया तूने क्या किया ?
 
यूपी बीजेपी के अध्यक्ष केशव मौर्य ने माफी मांगी. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सॉरी कहा. दयाशंकर सिंह को बीजेपी से सस्पेंड कर दिया गया, लेकिन कहते हैं ना कि बंदूक से निकली गोली और जुबान से निकली बोली वापस नहीं लौटती. वही हुआ. दयाशंकर सिंह के पीछे अब यूपी पुलिस पड़ी हुई है और पूरी बीएसपी लट्ठ लेकर बीजेपी के पीछे.
 
बीजेपी कीचड़ में, बीएसपी का चेहरा खिला !
 
राजनीति में समय, शख्सियत और शब्द बहुत मायने रखते हैं. मायावती को गाली देने वाले दयाशंकर अगड़ी जाति के हैं. गाली देते वक्त वो बीजेपी के बड़े नेता थे और गाली देने का समय उन्होंने ऐसा चुना, जब यूपी में चुनावों की उलटी गिनती बस शुरू ही होने वाली है. यूपी की सत्ता में वापसी का सपना देख रही बीजेपी की उम्मीदें दलितों और पिछड़ों पर हैं. 
 
 
उज्जैन सिंहस्थ कुंभ में समरसता स्नान करने वाली बीजेपी दयाशंकर के बयान के बाद यूपी की राजनीतिक कीचड़ में धंसती नज़र आ रही है, जबकि बाहर से आग-बबूला बीएसपी कार्यकर्ताओं के चेहरे अंदर से खिल गए हैं. बीएसपी को साफ दिख रहा है कि बहनजी और बीएसपी को स्वामी प्रसाद मौर्य और आरके चौधरी जैसे नेताओं की बग़ावत से जो डैमेज हुआ था, उसकी भरपाई दयाशंकर की गाली ने कर दी है.
 
दलित स्वाभिमान पर चोट ?
 
यूपी में पिछले दो दशक से दलितों का एक बड़ा तबका मायावती के रूप में अपने समाज का मान देखता रहा है. मायावती उसके लिए अपने समाज के स्वाभिमान की प्रतीक रही हैं. टिकट बेचने के आरोप के बाद जिन दलितों के मन में ये सवाल उठ रहा था कि मायावती ने दलितों के लिए क्या किया, उनके मन का सवाल भी अब दयाशंकर की गाली ने मन में ही दफन कर दिया है. 
 
 
बीएसपी के ज़मीनी कार्यकर्ताओं की राह आसान हो गई है कि वो दलित बस्तियों में जाकर लोगों को ये समझा सकें कि आज बहन जी की बेइज्ज़ती हुई है, तो कल तुम्हारी बहन-बेटियों की बारी आ सकती है. इसके सामाजिक और ऐतिहासिक प्रमाण भी दिए जाने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.
 
संस्कार पर सवाल, समीकरण भी बिगड़े !
 
बीजेपी के लिए दयाशंकर का पैदा किया संकट ज्यादा गहरा दिख रहा है. मुस्लिम विरोधी छवि निखारने के लिए पार्टी में योगी, साध्वी, साक्षी, ज्योति की कमी कभी नहीं रही.
 
अगड़ी जातियों की हिमायती पार्टी की छवि से दलित भी कभी खुलकर बीजेपी से नहीं जुड़े. 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद लालजी टंडन जैसे कद्दावर बीजेपी नेता ने मायावती के बहाने दलितों को साधने का रास्ता खोला था. 
 
 
बीजेपी के समर्थन से मायावती तीन बार यूपी में मुख्यमंत्री बनीं. 2002 में तो बहन जी ने लालजी टंडन को अपना राखी भाई भी बनाया. उससे बीजेपी को कोई फायदा बेशक ना हुआ हो, लेकिन अब दयाशंकर की गाली के बाद नुकसान ज़रूर होगा.
 
संस्कारों वाली पार्टी अब सवालों में है कि जिस बीजेपी का एक बड़ा नेता जिन मायावती से राखी बंधवाता है, उसी बीजेपी का दूसरा बड़ा नेता उन्हें भद्दी से भी ज्यादा भद्दी गाली देता है.
 
बीजेपी दलित विरोधी दाग़ कैसे धोएगी ?
 
दयाशंकर ने ऐसे वक्त में गाली कांड किया, जब बीजेपी गुजरात में दलितों के उत्पीड़न के संकट से घिरी हुई थी. गुजरात में दलितों के बेटों को पीटा गया और यूपी में ‘दलित की बेटी’ को गाली दी गई.
 
विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा मिला तो ये भी याद आ गया कि हैदराबाद में दलित छात्र रोहित वेमुला ने भी तो बीजेपी के राज में ही आत्महत्या की थी. अब हर पार्टी क्रोनोलॉजी गिना रही है कि देखो, यूपी और देश के दलितों ! बीजेपी तुम्हारे साथ क्या कर रही है. ये तो है ही दलित विरोधी पार्टी..इति सिद्धम् !
 
भागवत कथा जैसा दया’संकट’?
 
बीजेपी को दलित-पिछड़ा विरोधी बताने के लिए बिहार चुनाव के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान को विपक्ष ने हाथों-हाथ लपक लिया था, जबकि मोहन भागवत ने तो बहुत शालीनता के साथ सिर्फ इतना कहा था कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए. यहां तो दयाशंकर ने यूपी में ‘दलित आइकन’ बन चुकीं मायावती को अपशब्दों से नवाज़ा है. 
 
 
बीजेपी और उसकी असली ताकत संघ परिवार को अब यही सवाल सता रहा है कि कहीं बिहार में जो गुड़-गोबर मोहन भागवत के बयान ने किया था, कहीं दयाशंकर सिंह ने उससे बड़ा संकट यूपी में तो नहीं खड़ा कर दिया?