नई दिल्ली. असम में 34 परसेंट अल्पसंख्यक वोटों के चैंपियन होने का दावा करने वाले एआईयूडीएफ सुप्रीमो बदरुद्दीन अज़मल को असम कांग्रेस अल्पसंख्यक सेल के अध्यक्ष वाज़िद अली चौधरी ने 17 हजार वोट के अंतर से हरा दिया है. कांग्रेस असम में बुरी हार के बावजूद वाजिद के हाथों बदरुद्दीन की हार पर मुस्कुरा रही है.
 
सेकुलर वोटों का बिखराव रोकने के लिए नीतीश कुमार के कहने पर पॉलिटिकल स्ट्रैटजिस्ट प्रशांत किशोर असम गए थे और अजमल की कांग्रेस से गठजोड़ की कोशिश की भी की थी लेकिन तरुण गोगोई और अजमल के बीच निजी रंजिश इतनी गहरी थी कि बात बन नहीं पाई. 
 
असम में बीजेपी सरकार बनाएगी, ये चर्चा बहुत दिन से चल रही थी लेकिन ये भी कहा जा रहा था कि बदरूद्दीन अज़मल की पार्टी एआईयूडीएफ के पास सत्ता की चाबी जा सकती है. नतीजों निकला तो बेटा अब्दुर रहीम अजमल समेत पार्टी के 13 विधायक जीत गए लेकिन खुद पार्टी सुप्रीमो बदरुद्दीन अज़मल ही हार गए.
 
भाई से गुस्सा थे सालमारा दक्षिण को लोग इसलिए खुद उतरे थे बदरुद्दीन
 
लोकसभा में ढुबरी सीट से सांसद बदरुद्दीन अज़मल ने सालमारा दक्षिण सीट से खुद इसलिए पर्चा भरा था क्योंकि इस सीट पर उनके भाई अब्दुर रहमान अजमल के खिलाफ गुस्सा था जो 2011 में जीते लेकिन इलाके के लिए कुछ खास नहीं कर सके. लेकिन पूरे राज्य में मुस्लिम वोटों के रहनुमा बनते फिर रहे बदरुद्दीन अपनी ही सीट पर कांग्रेस के ही मुसलमान नेता से हार गए.
 
किंग मेकर बनने की चाहत का खुलकर इजहार कर चुके बदरुद्दीन अज़मल को कांग्रेस के वाज़िद अली चौधरी ने हराया जो पहले भी विधायक रह चुके हैं और पांचवीं बार लड़ रहे थे. वाज़िद असम कांग्रेस अल्पसंख्यक सेल के मुखिया भी हैं. वाज़िद अली को 80066 वोट मिले जबकि बदरुद्दीन को 63343 वोट.
 
दस साल पुरानी एआईयूडीएफ के 2011 में 18 एमएलए जीते थे. राज्य की 126 सीटों में 40 सीटों का फैसला मुसलमान वोटर करते हैं. 2014 के आम चुनाव में भी बदरुद्दीन की पार्टी को 25 सीटों पर बढ़त मिली थी और तीन लोकसभा सीट उसने जीत लिया था.
 
बेटा जीता, 13 MLA जीते पर बदरुद्दीन की घरेलू सीट बीजेपी उड़ा ले गई
 
बदरुद्दीन अपनी पार्टी और खुद की जीत को लेकर कितने भरोसेमंद थे कि उन्होंने न सिर्फ ये कहा कि असम में अगली सरकार बिना उनके सपोर्ट के नहीं बनेगी बल्कि ये भी कहा कि उनकी पसंद है कि प्रफुल्ल कुमार महंता अगले सीएम बनें.
 
अज़मल के बेटा अब्दुर रहीम अज़मल समेत पार्टी के 13 नेता चुनाव जीते हैं लेकिन उनकी पार्टी न तो किंग मेकर बनने की भूमिका में है और न पार्टी का किंग अपनी सीट बचा पाया. यहां तक कि अज़मल का घर जिस विधानसभा सीट होजई में आता है उस सीट को बीजेपी ने बड़े मार्जिन से जीत लिया है. होजई को 2011 में भी अज़मल की पार्टी ने नहीं, बल्कि कांग्रेस ने जीता था. 
 
मुसलमान स्ट्रैटजिक वोटिंग नहीं कर पाए लेकिन गैर मुस्लिम बीजेपी के पक्ष में एकजुट दिखे
 
होजई के बारे में कहा जाता था कि अज़मल की पार्टी इसलिए हार गई थी कांग्रेस से 2011 में क्योंकि मुसलमानों ने स्ट्रैटजिक वोटिंग की और कांग्रेस के एके डे को जिताया. लेकिन इस बार तो सारी स्ट्रैटजी बिखर गई क्योंकि बीजेपी के शिलादित्य देव ने 55 हजार के अंतर से जीत ली है. शिलादित्य को 105615 वोट मिले हैं. 
 
अज़मल की पार्टी के उम्मीदवार को 49756 और कांग्रेस के एके डे को 35207 वोट मिले. स्ट्रैटजी की बात छोड़कर अगर कांग्रेस और अज़मल के वोट भी मिला दें तो बीजेपी बहुत दूर रह जाती है. इस वोट फिगर से ऐसा लगता है कि होजई या राज्य के मुसलमान स्ट्रैटजिक वोटिंग तो नहीं कर पाए लेकिन गैर मुस्लिम वोट एकजुट होकर बीजेपी गठबंधन के पक्ष में गिरा.