नई दिल्ली. भूमि अधिग्रहण विधेयक पर संसद की संयुक्त समिति के लिए राज्यसभा के 10 सदस्यों को नामित किया गया है. वामपंथी नेताओं ने हालांकि, बाद में आरोप लगाया कि उनके किसी भी सदस्य का नाम इस सूची में शामिल नहीं है, जबकि सरकार ने उनके सदस्यों के नाम मांगे थे. यह प्रस्ताव केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बीरेंद्र सिंह ने बुधवार को पेश किया.

समिति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रभात झा और राम नारायण दूदी, कांग्रेस के जयराम रमेश, दिग्विजय सिंह और पी.एल.पुनिया, समाजवादी पार्टी (सपा) के राम गोपाल यादव, जनता दल (युनाइटेड) के शरद यादव, तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओब्रायन, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के राजपाल सिंह सैनी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के शरद पवार शामिल हैं.

सदन में मुद्दे को उठाते हुए मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता के.एन.बालागोपाल ने सवाल किया कि क्यों कंपनी विधेयक पर चर्चा के दौरान समिति में सदस्यों को नामित किए जाने का प्रस्ताव लाया गया. बालागोपाल ने कहा, “अपराह्न एक से 1.30 बजे के बीच भोजनावकाश के दौरान इसकी घोषणा की गई. कंपनी विधेयक पर चर्चा के दौरान क्यों प्रस्ताव लाया गया. समिति से वामदलों को दूर रखना गलत बात है.” उनके समर्थन में माकपा के सीताराम येचुरी ने कहा कि उनसे नाम लिए गए थे.

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि लोकसभा से माकपा के मोहम्मद सलीम भी समिति में हैं. येचुरी ने कहा, “क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा को अलग-अलग निकाय मानती है. यह वजह मत बताइए कि संयुक्त समिति में राज्यसभा के प्रतिनिधित्व की जरूरत नहीं होती.” राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन इस बात पर सहमत हो गए कि यह बेहतर होता अगर प्रस्ताव विधेयक के बाद पेश किया जाता. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए सदन की सहमति ली गई थी.

कुरियन ने कहा, “संविधान में राज्यों की परिषद पहले निर्दिष्ट है. क्योंकि इसमें अन्य सदन से एक सदस्य है, इस सदन के सदस्य को शामिल न करने का कोई कारण नहीं है.” लोकसभा ने विवादास्पद भूमि विधेयक को मंगलवार को दोनों सदनों की 30 सदस्यीय समिति के पास भेजा था. समिति अपनी रपट मानसून सत्र के पहले दिन सौंप सकती है.

केंद्र सरकार ने पिछले दिसंबर में भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन के लिए अध्यादेश पारित किया था. इस पर आधारित विधेयक बजट सत्र के पहले हिस्से में लोकसभा में पेश किया गया, जहां से यह पारित भी हो गया. लोकसभा में पारित होने के बावजूद यह विधेयक राज्यसभा में अटक गया, जहां सरकार अल्पमत में है. इसके बाद सरकार ने राज्यसभा के सत्रावसान के कारण एक अन्य अध्यादेश जारी किया और संबंधित विधेयक अब निचले सदन में पेश किया गया है.

IANS