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'इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट एलाउड' के खिलाफ छेड़ी थी एक स्टूडेंट ने जंग और फिर 80 साल लग गए डिग्री मिलने में

'इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट एलाउड' के खिलाफ छेड़ी थी एक स्टूडेंट ने जंग और फिर 80 साल लग गए डिग्री मिलने में

| Updated: Friday, September 23, 2016 - 13:05
Pritilata Waddedar, Politics, Britain, European countries

Pritilata Waddedar Politics of remembrance

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'इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट एलाउड' के खिलाफ छेड़ी थी एक स्टूडेंट ने जंग और फिर 80 साल लग गए डिग्री मिलने मेंPritilata Waddedar Politics of remembranceFriday, September 23, 2016 - 13:05+05:30
नई दिल्ली. महज 21 साल का उम्र थी उसकी. क्रांति उसके लहू में जोर जोर से उबाल मारने लगी थी. अपने इलाके में गिनती की पढ़ी लिखी लड़कियों में थी वो, ग्रेजुएशन में डिस्टिंक्शन लेने के बाद उसे एक अच्छे स्कूल में हैड मिस्ट्रेस का पद भी मिल गया. लेकिन उसे गुलामी बरदाश्त नहीं हो रही थी.
 
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एक यूरोपियन क्लब में उसने लिखा देखा 'इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट एलाउड' तो खून खौल उठा उसका और बोल दिया अपने क्रांतिकारियों के साथ धावा, जान देकर चुकाई इस धावे की कीमत और सोचिए भारतीयों की कुत्ते के साथ तुलना करने के चलते जिसने अपनी जान गवां दी, उसको डिग्री देने में उसके देश ने लगा दिए पूरे 80 साल. प्रीतिलता वाडेदार नाम था उसका, बचपन से ही उसकी टीचर उषा दी पूरी क्लास रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानियां सुनाया करती थी, को कोर्स में ना होने के वाबजूद.
 
बंगाल की एक और क्रांतिकारी कल्पना दत्ता भी प्रीतिलता की क्लासमेट थीं और कल्पना ने भी अपनी बायोग्राफी में अपनी इस टीचर और रानी लक्ष्मी बाई की कहानियों से मिलने वाली प्रेरणा का जिक्र किया है. आशुतोष गोवारीकर की फिल्म 'खेलें हम जी जान से' में कल्पना दत्ता का रोल दीपिका पादुकोण और प्रीतिलता का रोल विशाखा सिंह ने किया था.
 
प्रीति रानी लक्ष्मीबाई की कहानियों से और भी ज्यादा जुड़ जाती थीं क्योंकि उनको भी घर में सब लोग प्यार से 'रानी' कहते थे. चटगांव के एक गांव में पैदा हुईं प्रीतिलता शुरू से ही पढ़ाई में सुभाष चंद्र बोस की तरह ही सबसे आगे थीं. इंटरमीडिएट में उनका एडमीशन ईडन कॉलेज ढाका में हुआ. 6 भाई बहनों के साथ पली बढ़ी प्रीति के पिता चटगांव म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में क्लर्क थे और अपने बच्चों को अच्छी पढ़ाई देना चाहते थे.
लेकिन प्रीतिलता ने तो उम्मीदों का तूफान खड़ा कर दिया. इंटरमीडिएट का रिजल्ट जब आया तो पूरे परिवार की खुशी चरम पर पहुंच गई. प्रीति ने पूरा ढाका बोर्ड टॉप किया था. लेकिन प्रीति के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था. वो पढने के दौरान ही लीला नाग से जुड़ गईं. लीला नाग ढाका यूनीवर्सिटी से लड़कर उसमें एडमीशन लेने वाली और एमए करने वाली पहली महिला बन गई थी. महिला लेखकों की मैगजीन और महिलाओं को कॉम्बेट ट्रेनिंग देने के लिए उन्होंने एक संस्था शुरू की, दीपाली सांघा. प्रीति ने भी इसकी एक ब्रांच श्री संघा में ट्रेनिंग ली, लीला बाद में सुभाष चंद्र बोस की करीबी सहयोगी के तौर पर उभरीं.
 
फिर प्रीति ग्रेजुएशन करने के लिए कोलकाता चली गईं. वहां बैथून कॉलेज में एडमीशन ले लिया. फिलॉसफी से ग्रेजुएशन उन्होंने डिस्टिंक्शन के साथ किया. लेकिन क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोपों के चलते ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रीति की डिग्री पर रोक लगा दी. ग्रेजुएशन खत्म होते ही प्रीति वापस चटगांव लौट आईं और एक इंगलिश मीडियम स्कूल में हैडमिस्ट्रेस बन गई. ये 1931-32 की बात है. प्रीतिलता लगातार क्रांतिकारियों के सम्पर्क में थीं, लेकिन क्रांतिकारी महिलाओं को अपने ग्रुप में शामिल करने के खिलाफ थे.
 
ऐसे में चटगांव विद्रोह के नायक मास्टर सूर्यसेन, जिनका रोल 'खेले हम जी जान से' मूवी में अभिषेक बच्चन ने किया था, ने उनको मिलने बुलाया. 13 जून 1932 का दिन था, सूर्यसेन उनकी ख्वाहिश और उनकी प्रतिभा दोनों के ही बारे में काफी सुन चुके थे और पहले से प्रभावित थे.
 
एक क्रांतिकारी बिनोद बिहारी चौधरी ने महिलाओं के ग्रुप में शामिल करने का जमकर विरोध किया, लेकिन निर्मल सेन और सूर्यसेन ने उनको शामिल करने की पैरवी की. दोनों का तर्क था कि हथियार एक ठिकाने से दूसरे ठिकाने लाने ले जाने या भीड़ भरी जगहों, दफ्तरों, समारोहों में दुश्मन की टोह लेने के लिए, स्थिति का जायजा लेने के लिए महिलाएं काफी मददगार साबित हो सकती हैं और उन पर आसानी से कोई शक भी नहीं करता.
 
उससे पहले प्रीतिलता क्रांतिकारी रामकृष्ण विश्वास के भी संपर्क में अरसे तक रहीं। जब 1931 में आईजी चटगांव मिस्टर क्रेग को मारने के मिशन पर विश्वास और कालीपद चक्रवती को भेजा गया तो गलती से उन्होंने एसपी की हत्या कर दी और पुलिस की गिरफ्त में भी आ गए. ऐसे में कोलकाता में रहते हुए प्रीति लता अलीपोर जेल में बंद रामकृष्ण विश्वास के कैसे कुछ ही महीनों में अलग अलग तरीके अपनाकर पूरे चालीस बार मिलीं, उससे सूर्यसेन हैरत में थे क्योंकि ऐसे गंभीर अपराध में लिप्त लोगों से किसी को मिलने की इजाजत नहीं थी. बाद में विश्वास को फांसी दे दी गई.
 
सूर्यसेन ने प्रीतिलता को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी. फिर टेलीफोन और टेलीग्राफ ऑफिसों में हमला बोलना शुरू कर दिया, प्रीति ने बढ़ चढ़ कर इनमें हिस्सा लिया. एक बार पुलिस लाइन को भी सूर्यसेन की अगुआई में कब्जा कर लिया गया और प्रीति का रोल इसमें अहम था. इसके चलते प्रीति का नाम पुलिस की मोस्ट वांटेड लिस्ट में शामिल हो गया. प्रीति लता को पहाड़तली के एक यूरोपियन क्लब में लगे बोर्ड से काफी खुंदक थी, उस बोर्ड पर साफ साफ लिखा था कि ‘डॉग्स एंड इंडियंस आर नॉट एलाउड’. साफ था कि इंडियंस की तुलना कुत्तों से की गई है.
 
सूर्यसेन समेत बाकी क्रांतिकारियों के निशाने पर भी वो क्लब काफी पहले से था। प्रीतिलता चाहती थी कि उस क्लब में वो यूरोपियनों को अपने हाथों से सबक सिखाएं. लेकिन सूर्यसेन चाहते थे कि कोई भी क्रांतिकारी जिंदा इस धावे में नहीं लगना चाहिए, नहीं तो उनका बड़ा प्लान पुलिस और अंग्रेज अघिकारियों के हाथ लगने का डर था.
 
प्रीति हर हाल में इस मिशन की इंचार्ज बनना चाहती थी. प्रीति ने सूर्यसेन को भरोसा दिलाया कि कोई भी क्रांतिकारी पुलिस के हाथ जिंदा नहीं आएगा और इस का रास्ता ये निकाला गया कि अगर किसी भी तरह से ऐसा लग रहा है कि वो पुलिस के हाथ में पड़ सकता है, तो अपने पास रखा पोटेशियम साइनाइड खा ले. क्योंकि पुलिस वाले हथियार सबसे पहले छीनते थे.
 
सो सबने अपने पास पोटेशियम साइनाइड अपने अपने पास छिपा कर रख लिया. उन्होंने ये मान लिया था कि जान मिशन से ज्यादा कीमती नहीं थी. 23 सितम्बर 1932 की शाम थी, केवल 21 साल की उम्री में प्रीति लता को 10 से 12 साथियों के साथ मिशन हैड बनाकर. प्रीति खुद पुरुष वेश में ही थी. उस वक्त क्लब में करीब पचास यूरोपियंस की पार्टी चल रही थी.
 
पुरूष वेश में प्रीति अपने साथियों के साथ पीछे की गली से क्लब में घुस गई. प्रीति और उसके साथियों ने अचानक हमला बोल दिया. ये हमला तीन तरफ से तीन अलग अलग ग्रुप बनाकर किया गया था. वो उनको सबक सिखाना चाहते थे कि हिंदुस्तान की ही धरती पर हिंदुस्तानियों की कुत्ते के साथ तुलना करना, उन पर क्लब में आने जाने पर रोक लगाना कितना गलत है. एक की मौत हुई और कई लोग बुरी तरह घायल हो गए.
 
कई यूरोपियंस हथियार बंद और कई उनमें से आर्म्ड फोर्सेज के ऑफीसर्स थे, पुलिस वाले भी थे. एकदम हाहाकार मच गया, प्रीति चाहती तो बचकर भाग सकती थी, लेकिन पहले उसने एक एक करके अपने सभी साथियों को बाहर निकाला और इसी अफरातफरी में प्रीति को एक गोली भी लग गई. उसने खुद को भाग पाने में असमर्थ पाया और जिंदा गिरफ्तार होती तो सूर्यसेन के मिशन को नुकसान होता.
 
पुलिस पूरे समूह की सारी जानकारियां निकलवा सकती थी. प्रीति ने बिना देर किए अपनी जिंदगी का आखिरी और सबसे खतरनाक फैसला लिया, वो अकेली बची थी. उसने पोटेशियम साइनाइड खा लिया. प्रीति की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी यही आया कि गोली से वो घायल जरूर हुई थी लेकिन मौत साइनाइड खाने से ही हुई है. प्रीति के मृत शरीर के पास एक पर्चा मिला, जिसमें स्वयं प्रीतिलता की लिखावट थी- आज, महिलाएँ और पुरुष-दोनों एक ही लक्ष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं, फिर दोनों में फ़र्क़ क्यों? 
 
प्रीति को खुद को साबित करने की जिद थी और उसने किया भी, ना केवल पढ़ाई के फील्ड में बल्कि देश के लिए किसी भी हद तक जोखिम भरे काम करने में, जान तक गंवा दी अपनी. लेकिन ब्रिटिश सरकार प्रीति की डिग्री पर रोक लगा दी. कॉनवोकेशन फंक्शन में ही एक अंग्रेज अधिकारी पर हमला करने वाली बीना दास की भी डिग्री सरकार ने रोक दी. 15 साल बाद देश आजाद हो गया.
 
प्रीति की याद में वीरकन्या प्रीतिलता ट्रस्ट बनाया गया, जो हर साल बांग्लादेश और भारतमें कई कार्यक्रम आयोजित करता है. जिस जगह उन्होंने साइनाइड खाया था, उसको उनका स्मारक बना दिया गया. चटगांव में एक रोड का नाम उनके नाम पर रखा गया, यहां तक कि उस यूरोपियन क्लब के सामने उनकी एक कांसे की प्रतिमा भी लगा दी गई. बांग्लादेश को तो याद रहा लेकिन भारत के लोग भूल गए.
 
2012 में किसी ने याद दिलाया कि प्रीति की डिग्री पर आज तक अंग्रेजी हुकूमत की रोक जारी है. यूनीवर्सिटी ने उनकी मौत के अस्सी साल बाद भी उनको या परिवार को उनकी डिग्री जारी नहीं की है. राज्यपाल एमके नारायण को जब ये पता चला तो फौरन कोलकाता यूनीवर्सिटी को 1932 के रिकॉर्ड चैक करने के लिए कहा, प्रीति और बीना दोनों की डिग्रियां तैयार करने को कहा.
 
2012 में जाकर उनकी डिग्रियों को जारी करने पर लगी रोक कोलकाता यूनीवर्सिटी ने हटाई. इस देश के इतिहास में ऐसी कई कहानियां बिखरी पड़ी हैं, आजादी के पचपन साल बाद देश से बाहर तमाम क्रांतिकारियों के अभिभावक के रूप में अपना सब कुछ दाव पर लगा देने वाले इंडिया हाउस के संस्थापक श्यामजी कृष्ण वर्मा की अस्थियां मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी लेकर आए थे.
 
First Published | Thursday, September 22, 2016 - 23:36
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Web Title: Pritilata Waddedar Politics of remembrance
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