बुजुर्ग मुस्लिम महिला शाह बानो और उसके पूर्व पति के तलाक के बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारों की स्थापना करते हुए अपना निर्णय दिया, तब उनके समुदाय कह महिलाओं ने इस निर्णय पर प्रसन्नता जताई. आखिरकार, जैसा कि आरिफ अली खान ने ध्यान दिलाया था कि अधिकांश पुरुष केवल पति ही नहीं बल्कि बेटियों के पिता, बहनों के भाई और महिलाओं के मित्र व रिश्तेदार भी होते हैं, जिनमें से प्रत्येक का भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त कानून के संरक्षणों पर पूरा अधिकार है. कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर विरोध जताया और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि सऊदी अरब की तरह भारत में भी मुस्लिम महिलाओं के अकेले बाहर जाने और कार चलाने को प्रतिबंधित किया जाए. 1985 में किसी भी मुद्दे पर दंगे भड़काने और विरोध-प्रदर्शन कराने के लिए महज कुछ लाख रुपयों की जरूरत पड़ती थी. आज इस स्थिति में केवल इतना बदलाव आया है कि लाखों की जगह करोड़ों ने ले ली है. दुर्भाग्य से, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद पूर्वानुमेय गौण विरोध-प्रदर्शनों ने राजीव गांधी को ऐसा कानून पारित करने के लिए राजी किया, जिसने मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद ऐसे अधिकारों का लाभ उठाने से वंचित कर दिया जो अन्य समुदायों की महिलाओं को प्राप्त थे. इससे पहले 1971 में इंदिरा गांधी भी मुस्लिम महिलाओं को सऊदी शैली में प्रतिबंधों से मुक्त कराने व उन्हें बराबरी का दर्जा प्रदान करने के अपने वायदे से पीछे हट गई थीं. उससे भी पहले 1955 में हिंदू कोड बिल का मसौदा करने के दौरान जवाहरलाल नेहरू ने ईसाइयों और मुस्लिमों को आधुनिकता का रंग देने की भीमराव अंबेडकर की सलाह को खारिज कर दिया था, जिनके व्यक्तिगत कानूनों को फलस्वरूप अछूता छोड़ दिया गया था.
 
मध्यकालीन युग के बाद से समाज में परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील संहिता को अधिनियमित करने की एकल परिवार की तिहरी विफलता का परिणाम यह है कि पाकिस्तानी मुस्लिम महिलाओं की तुलना में भारतीय मुस्लिम महिलाओं के पास आज कानूनों के तहत संरक्षण का बहुत कम स्तर है.मुसलमान ऐसे मजहब से संबंध रखते हैं जिसके भारत के 16 लाख मुसलमानों सहित दुनिया भर में एक अरब से भी ज्यादा अनुयायी हैं.जाहिर है कि इतनी बड़ी संख्या के अस्तित्व को शायद ही कोई खतरा हो सकता है.लेकिन 1930 के दौर में, उपमहाद्वीप में कुल जनसंख्या के भीतर बड़ा हिस्सा होने के बावजूद सभी क्षेत्रों और वर्गों से संबंधित मुसलमानों ने मोहम्मद अली जिन्ना के इस बेबुनियाद दावे पर यकीन कर लिया कि स्वतंत्रता के बाद भारत में हिंदुओं द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार किए जाएंगे और उनके नागरिक अधिकार उनसे छीन लिए जाएंगे.विभिन्न कट्टरपंथी संगठनों द्वारा जिन्ना के डराने की रणनीति को आज तक विभिन्न रूपों में जारी रखा जा रहा है.1931-47 की अवधि के दौरान कांग्रेस पार्टी मुस्लिम लीग के उन आरोपों का प्रत्युत्तर देने में विफल रही, जिनका इरादा मुस्लिम समुदाय के भीतर भय उत्पन्न करना था.जिन्ना के भारत को टुकड़ों में बांटने के अभियान को महात्मा गांधी ने और बढ़ावा दिया जिन्होंने अपने एक पुत्र को इस्लाम में धर्मांतरण करने के कारण परिवार से अलग कर दिया था.तब से, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के बावजूद एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के सदस्यों की हत्या करने की कई घटनाएं हो चुकी हैं.लेकिन इन घटनाओं के कारण मुस्लिम समुदाय के बीच यह खौफ उत्पन्न करना कि मुसलमानों को उन्मादी हिंदू कट्टरपंथियों के हाथों मौत का आसन्न खतरा है, न केवल हास्यापद है बल्कि अतीत के इतिहास के संदर्भ में गैर-जिम्मेदराना भी है.
 
हकीकत में, मुस्लिम समुदाय के लिए सबसे प्रबल खतरा और उद्यम के कई क्षेत्रों में उसकी सफलता की कमी का प्रमुख कारण यह तथ्य है कि इस समुदाय के अधिकांश बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ते हैं जहां उन विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया जाता जो 21वीं सदी में सफलता प्राप्त करने के लिए अत्यावश्यक हैं.मदरसे, वेद पाठशालाएं और बाइबिल स्कूल पारंपरिक स्कूली शिक्षा का स्थान नहीं ले सकते.जहां कहीं भी मुस्लिम उच्च गुणवत्ता वाली आधुनिक शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं, वहां वे आमतौर पर विभिन्न व्यवसायों व पेशों में अग्रणी रहते हैं. अगर इस्लामी ग्रंथ के कुछ भाग हिंसा और युद्ध की बात करते हैं तो हिंदूत्व, यहूदी धर्म और ईसाइयत ग्रंथों के कुछ भागों में भी हिंसा और युद्ध की आवश्यकता का वर्णन किया गया है.लेकिन, बाद के तीन धर्मों में हिंसा और युद्ध पर चर्चाओं को उतनी अहमियत नहीं दी जाती जैसा कि इस्लाम में किया जाता है.ऐसी चयनात्मकता का परिणाम यह निकला है कि हर जगह समाज में गैर-मुस्लिमों का यह मानना है कि अजमेर दरगाह के दीवान साहिब और इमाम बुखारी के सुलतान शाहीन के बजाय ओसादुद्दीन ओवैसी द्वारा प्रोत्साहित व्यक्ति ही सबसे सटीकता के साथ मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं.यह कि केवल बुर्का या लंबी दाढ़ी रखने वालों को ही दुनिया में सबसे लोकतांत्रिक धर्मों में से एक के ‘वास्तविक अनुयायियों’ के रूप में देखा जाता है.शेष समाज द्वारा धर्म व उसके अनुयायिओं को विशिष्ट रूप में पहचानने में की गई गलतियां उस समाज के गौण तत्वों के कथित महत्व की कुल वृद्धि का कारण   बनी हैं, जबकि हिंदू और सिख समुदायों में ऐसे तत्वों को सही रूप से मुख्य के बजाय गौण तत्वों के रूप में वर्गीकृत किया गया है.
 
अगर आज मुस्लिम समुदाय को वहाबीवाद द्वारा आकर्षित होने की पीड़ा से होकर गुजरना पड़ रहा है तो इस चूक के लिए कुछ हद तक गैर-मुसलमानों द्वारा मुस्लिम समुदाय के गौण तत्वों के साथ किया गया व्यवहार भी जिम्मेदार है.उन्हें उनके समुदाय के ऐसे वास्तविक प्रतिनिधियों के रूप में देखा गया जो भारत में जैन, हिंदुओं, सिखों ईसाइयों व बौद्ध धर्म के लोगों जितने ही उदार हैं. उम्मीद करते हैं कि अगली बार जब कभी भी राष्ट्रीय टेलीविजन पर चर्चा होगी अथवा नीति-निर्माताओं के साथ बातचीत के लिए प्रतिनिधिमंडल को आमंत्रित किया जाएगा, तब सुलतान शाहीन और दीवान साहेब को गौण सहधर्मियों पर प्राथमिकता दी जाएगी.    
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)