सकारात्मक राजनीतिक परिवर्तन एक जुनून द्वारा प्रेरित होती है, जबकि राजनीतिक जुनून को अक्सर अथक प्रतिद्वंदियों के बीच टकराव से बल मिलता है. यह अक्सर सभी तार्किक बहस और बातचीत को दूर करते हुए शातिर शब्दाडंबर के दुर्गम क्षेत्र में भटक जाती है और इस प्रकार, लोकतांत्रिक संस्थाओं को नैतिक कंगालियत के खतरे में डाल देती है. पिछले सप्ताह भाजपा और कांग्रेस के शब्दों का युद्ध छिड़ गया जो राजग सरकार द्वारा सत्ता ग्रहण करने के बाद से अब तक का सबसे निकृष्टतम वाक्युद्ध था. आमतौर पर देखा गया है कि चुनाव के खत्म होते ही राजनीतिक पार्टियां प्रशासन और विधि निर्माण के गंभीर कार्य में व्यस्त हो जाती हैं. लेकिन, बिहार चुनाव से एक-दूसरे पर निरंतरता के साथ निंदा व तिरस्कार की बौछार करने में लगे रहे. इन दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों से संसद में लंबित कई विधायी मुद्दों का समाधान करने के लिए एक-दूसरे को संलग्न करने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन विचारधाराओं के बजाय व्यक्तिगत हमलों से शासन प्रक्रिया के पंगु होने की पूरी संभावना है.
 
बिहार चुनाव को व्यक्तित्व शक्ति के आकलन के इर्द-गिर्द लड़ा गया था. चुनाव लड़ रहे सभी दलों ने अपने विरोधियों के खिलाफ निकृष्टतम गाली-गलौच का इस्तेमाल किया. राजनीतिक युद्ध दो केंद्रीय व्यक्तित्वों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तक सीमित रह गया था. यह स्पष्ट हो गया था कि दोनों दल यह उम्मीद करते हैं कि भविष्य के सभी चुनावी युद्ध नीतियों के नहीं बल्कि शख्सियतों के इर्द-गिर्द लड़े जाएंगे.भारत की नई राजनीति ऐसे नीति-निर्माण के इर्द-गिर्द घूमती है जिसका मकसद नेताओं का निर्माण करना, उन्हें बढ़ावा देना, नष्ट करना और उनकी छवि को धूमिल करना है.विचारधारा निरर्थक हो चुकी है.ऊंचे अहंकार वाले नेताओं ने विचारधारा के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है.नेताओं के अहंकार के परस्पर युद्ध के साथ बातचीत का विफल होना हमारे लोकतंत्र को दूषित कर रहा है जो उन मतदाताओं के लिए अशुभ संकेत है जिन्होंने बेहतर भारत की आशा में उन्हें निर्वाचित किया था. इस तनावपूर्ण वाक्युद्ध की शुरुआत भाजपा ने अपने तेजतर्रार नेता सुब्रमण्यम स्वामी के साथ की थी, जिन्होंने राहुल गांधी पर ब्रिटिश नागरिक होने व इंग्लैंड में कई निजी कंपनियों के स्वामित्व में भागीदार होने का आरोप लगाया था.कांग्रेस ने सुब्रमण्यम के इस आरोप का तीव्रता के साथ खंडन किया.इससे कुछ दिन पहले हरियाण के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने रॉबर्ट वाड्रा को छह माह के भीतर जेल में डाल दिए जाने की घोषणा की थी.भाजपा नेतृत्व भी राहुल-विरोधी मुहिम में शामिल हो गया और कांग्रेस से स्पष्टीकरण की मांग की.बिहार की सफलता से बागो-बाग कांग्रेस ने प्रचुर आक्रामकता के साथ भाजपा पर जवाबी हमला बोला जिसकी अगुवाई स्वयं राहुल गांधी ने की.राहुल ने भाजपा के बजाय प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर लिया.राहुल के नक्शेकदम पर चलते हुए अन्य कांग्रेसी नेताओं ने भी प्रधानमंत्री मोदी को आड़े हाथों लिया.गांधी परिवार के समर्थक मणिशंकर अय्यर ने पाक मीडिया में अपना विषैला रूप दिखाया.टीवी रिपोर्ट के अनुसार अय्यर ने कहा कि सबसे पहले मोदी को हटाना आवश्यक है अन्यथा वार्ता आगे नहीं बढ़ पाएगी.हमें चार वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी.यह लोग मोदी के प्रति बहुत आशावादी हैं, उनका सोचना है कि मोदी की उपस्थिति में बातचीत आगे बढ़ेगी लेकिन मुझे ऐसा बिलकुल नहीं लगता. 
 
मोदी के प्रति कांग्रेसी जुनून को अच्छी तरह समझा जा सकता है क्योंकि उन्होंने भाजपा को लोकसभा में अपने बूते पर स्पष्ट बहुमत दिलाकर कांग्रेस के राजनीतिक एकाधिकार को तोड़ दिया है.प्रधानमंत्री मोदी को इंदिरा गांधी के बाद सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली नेता माना जाता है.कांग्रेस को भय है कि जब तक नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता बरकरार रहेगी, तब तक उसकी केंद्रीय सत्ता में वापस आने की संभावना लगभग शून्य के बराबर है.एक सोची-समझी रणनीति के अनुसार राहुल ने हमेशा मोदी को निशाने पर रखा हुआ है.सबसे पहले राहुल ने मोदी की सरकार को सूट-बूट की सरकार करार दिया.उसके बाद उन्होंने कॉरपोरेट दिग्गजों के साथ प्रधानमंत्री की कथित निकटता पर व्यंग्य किया.राहुल ने अपने पार्टी नेताओं को स्पष्ट कर दिया है कि अगर कुछ राज्यों में कांग्रेस के हितों को त्यागने से मोदी की छवि को नुकसान पहुंचता है तो उन्हें इसमें कोई हर्ज नहीं है.कांग्रेस बिहार में गठबंधन में केवल इसलिए शामिल हुई ताकि एक अजेय नेता के रूप में प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके.पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार राहुल, नीतीश और लालू ने मिलकर सुनिश्चित किया कि बिहार की चुनावी लड़ाई को मोदी और अन्यों के बीच की लड़ाई में परिवर्तित किया जाए.राहुल ने तय कर लिया है कि भाजपा और सरकार की सभी विफलताओं के लिए केवल और केवल मोदी को ही जिम्मेदार ठहराया जाए.कांग्रेस प्रधानमंत्री पर और अधिक निजी हमले करने में बिलकुल नहीं झिझकेगी.कांग्रेस की आलाकमान को पूरा भरोसा है कि अर्थव्यवस्था के खराब प्रदर्शन के साथ, ‘विकास पुरुष’ के रूप में मोदी की छवि कुंद पड़ जाएगी.इसके   अतिरिक्त कांग्रेस व उसके समर्थकों ने राहुल को सुर्खियों में लाने पर पूरा ध्यान केंद्रित कर लिया है क्योंकि उनका मानना है कि राहुल ही अखिल भारतीय पहचान वाले एकमात्र नेता हैं जो युवा भी हैं और मोदी का प्रभावी रूप से मुकाबला कर सकते हैं.
 
यह विडंबना ही है कि जहां कांग्रेस राहुल के साथ तैरने या डूबने को लेकर दृढ़-संकल्प है, भाजपा ने भी श्रीमान गांधी पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला कर लिया है.शीघ्र ही, आने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलेगी.इसलिए सत्तारूढ़ राजग सरकार राहुल के प्रभाव को कम करना चाहेगी.आने वाले 12 माह में केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम आदि राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे.इन सभी चुनावों में भाजपा से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है.शर्मनाक हार से भाजपा और प्रधानमंत्री की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.चूंकि, राहुल ने कांग्रेस पार्टी का प्रभार लगभग संभाल ही लिया है, इससे पहले वह राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नेता के रूप में उभरें, भाजपा चाहेगी कि उनकी प्रगति को बीच में ही रोक दिया जाए.कुछ भाजपा नेताओं को तो पहले से ही राहुल पर जितना अधिक हो सके, उतना कीचड़ उछालने की भूमिका दे दी गई है. आगामी संसद शीतकालीन सत्र इन दो प्रमुख दलों के बीच बढ़ती कड़वाहट का प्रमुख पीड़ित बनने वाला है.सरकार को देश में ऐसा सकारात्मक माहौल सजीव करना होगा, ताकि घरेलू उत्पादन और रोजगार में वृद्धि हो सके.सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष के बीच रचनात्मक सहयोग भी प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गई कुछ योजनाओं के कार्यान्वयन में मदद कर सकता है.दुर्भाग्य से, दोनों दलों में मौजूद नकारात्मक तत्व उनके संगठनों में अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए व्यक्तिगत झगड़ों को जीवित रखने के प्रति दृढ़संकल्प हैं.व्यक्तित्वों के इस टकराव में राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ाई जा रही है.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)