कांग्रेस के भीतर चल रहा युद्ध अब जगजाहिर हो गया है. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र, और पूर्वी दिल्ली से दो बार सांसद रह चुके संदीप दीक्षित द्वारा हाल ही में दिया गया बयान कि पार्टी के पुनरुद्धार के लिए सोनिया गांधी अब भी सबसे श्रेष्ठ नेता हैं, स्पष्ट रूप से पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी की क्षमताओं पर किंचित मात्र भी भरोसा न करने की अभिव्यक्ति है.

दीक्षित, जिन्होंने कभी राहुल के पक्ष में बयानबाजी की थी, राजधानी में हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों के दौरान पूरी तरह से नजरअंदाज किए जाने को लेकर जाहिर तौर पर झुंझलाए हुए हैं जहां कांग्रेस एक भी सीट जीत पाने में नाकाम रही थी. और जो लोग इस सबसे पुराने राजनीतिक दल की कार्यशैली से भली-भांति परिचित हैं, दीक्षित ने जो कुछ भी कहा है, वैसा कहने के लिए उन्हें एक विशेष समर्थक दल द्वारा उकसाया गया है. जब सोनिया गांधी खुद राहुल की पदोन्नति की इच्छुक हैं, ऐसा कतई नहीं हो सकता कि संदीप दीक्षित राहुल की पदोन्नति के विरोध में कोई बयानबाजी करते.      

अपनी टिप्पणियां में बेहद चतुराई से शब्दों का इस्तेमाल करने वाले पूर्व सांसद, जो खुद अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए अपनी मां के आभारी हैं, सोनिया मण्डली के उन कई सदस्यों के विचारों को प्रतिबिंबित करते हैं जिन्होंने अपनी सामूहिक ताकत का इस्तेमाल राहुल को दूर रखने के लिए, और पार्टी की हर विफलता का दोषी राहुल को ठहराने के लिए किया है. हालांकि, सच्चाई यह है कि पार्टी की दयनीय दशा के लिए सोनिया मण्डली खुद जिम्मेदार है. इसलिए, यह वास्तव में अटपटा है कि दीक्षित, जो अच्छी तरह जानते हैं कि सोनिया गांधी के समग्र नेतृत्व में पार्टी ने भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे शर्मनाक प्रदर्शन किया है, अब भी उन्हें पार्टी प्रमुख के रूप में बने रहना देखना चाहते हैं. क्या दीक्षित चाहते हैं कि अगले संसदीय चुनावों में पार्टी की सीटों का आंकड़ा 44 से भी नीचे गिर जाए?

दीक्षित अकेले ही नहीं हैं बल्कि मिलिंद देओरा, प्रिया दत्त और सचिन पायलट भी उन युवा नेताओं में से हैं जो सोनिया की निरंतरता के पक्ष में हैं. दूसरे शब्दों में, वे उस मण्डली की भाषा बोल रहे हैं जो महसूस करती है कि एक बार जब कांग्रेसी अध्यक्ष को बदल दिया गया, तो उसका प्रभाव घटना शुरू हो जाएगा. उनमें से कोई भी खुलेआम राहुल का विरोध नहीं कर सकता, इसलिए सोनिया गांधी को समर्थन देना उनके लिए अपने विचारों को सूचित करने का सबसे उत्तम तरीका है. राहुल गांधी के अचानक अवकाश पर जाने की वजह को लेकर कई कहानियां सुनने को मिल रही हैं, विशेष रूप से जब उनकी मौजूदगी, निकट भविष्य में उनकी मां का उत्तराधिकारी बनने में उनकी मदद कर सकती थी. बजट सत्र के दौरान अचानक अवकाश पर जाकर यह संदेश दिया गया है कि वह हमेशा से एक ऐसे अनिच्छुक नेता थे जो जिम्मेदारी स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे.

ऐसा कहा जा रहा है कि उनके दिवंगत पिता ने 45 वर्ष की आयु तक  देश के प्रधानमंत्री के रूप में पूरा कार्यकाल संपूर्ण कर लिया था, और राहुल, जो आगामी जून में 45 वर्ष के हो जाएंगे, का अभी भी स्वेच्छा से संपूर्ण पारी की शुरुआत करना बाकी है. आदर्श रूप से बोलते हुए, राहुल को लोकसभा में कांग्रेसी समूह का नेता होना चाहिए था और यह उन्हें मोदी सरकार से सीधे टकराव के लिए मंच प्रदान करता. इतने तुच्छ आंकड़ों के साथ ये कैसे होता, ये कोई भी समझाने में असमर्थ रहा है. और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि राहुल के प्रयासों को क्षीण न किया गया होता जैसे अतीत में उनकी मां के करीबी अक्सर करते रहे हैं. राहुल का प्राथमिक एजेंडा, कुछ वरिष्ठ नेताओं से छुटकारा पाना है और ऐसा तभी हो सकता है जब उनकी मां अपना पद-त्याग कर उनके प्रभार संभालने के लिए मार्ग प्रशस्त करें. ऐसी अफवाह भी उड़ रही है जो राहुल और उनकी मां, सोनिया और उनकी बहन प्रियंका के बीच घनिष्ठ बंधन को देखते हुए बहुत असंभव प्रतीत होती है.

ऐसा कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी की कार्यपद्धति को लेकर राहुल की अपनी बहन के साथ बहस हुई थी. समझा जाता है कि प्रियंका, जिन्हें पार्टी में कई नेताओं एवं कार्यकर्ताओं द्वारा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जो इंदिरा गांधी की राजनीतिक विरासत की अंतत: वारिस बनेंगी, ने राहुल को बताया कि वह पार्टी में जो कुछ भी करना चाहते हैं, करने के लिए स्वतंत्र हैं और अपनी इच्छा से किसी को भी नियुक्त कर सकते हैं. लेकिन इस सब के बीच एकमात्र चीज जिसमें किसी प्रकार का बदलाव नहीं होगा वो ये कि उनकी मां सोनिया गांधी जब तक हमारे बीच मौजूद हैं, वह पार्टी अध्यक्ष के पद पर और पार्टी की मुख्य संरक्षक बनी रहेंगी. यह भी मालूम नहीं हो सका है कि प्रियंका ये सब कुछ आखिर क्यों कहेंगी लेकिन कांग्रेस में कइयों ने दृढ़ता से कहा है कि इस बात ने राहुल को पार्टी के मामलों से कुछ समय के लिए पीछे हटने के लिए उकसाया. इस संदर्भ में, दीक्षित के विचारों को उनके कई आलोचकों द्वारा प्रियंका को रिझाने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है. एक अन्य तुच्छ कहानी के मुताबिक, राहुल ने शादी कर ली है और इसलिए राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं थे. अगर यही बात होती, तो राहुल इसे गुप्त क्यों रखते? जबकि   ऐसी अनगिनत कहानियों की सच्चाई की पृष्टि कोई भी नहीं कर सकता, मामले की सच्चाई यह है कि अगले माह राहुल को पार्टी अध्यक्ष बनाना सुनिश्चित करने के लिए भरसक प्रयास किए जा रहे हैं. ऐसा होगा अथवा नहीं, इस प्रश्न का उत्तर केवल समय के गर्भ में छिपा है.

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)