भारतीय जनता पार्टी मार्गदर्शक मंडल के चार सदस्यों द्वारा बिहार विधानसभा चुनावों में हार के लिए जिम्मेदारी तय करने के बयान ने इस अवधारणा की पृष्टि की है कि संघ परिवार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. पार्टी संविधान की उल्लंघन कर वर्तमान नेतृत्व द्वारा मार्गदर्शक मंडल का निर्माण दरअसल लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी को दरकिनार करने के लिए किया गया था, जिन्होंने अटल बिहार वाजपेयी के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की थी. विपक्षी कांग्रेस पार्टी द्वारा गत वर्ष मार्गदर्शक मंडल को भाजपा के उम्रदराज नेताओं के लिए ‘वृद्धाश्रम’ के रूप में वर्णित किया गया था जो नेताओं की नई खेप के लिए असुविधाजनक बन गए थे. लेकिन राजनीतिक धूर्तता का उम्र से कुछ लेना देना नहीं है और बिहार चुनाव नतीजों ने इन उम्रदराज दिग्ग्जों को जवाबी हमला करने के लिए सही अवसर प्रदान किया है. दीपावली और नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन यात्रा की पूर्वसंध्या पर सतर्कतापूर्वक वर्णित किए गए बयान ने संघ हलकों में हलचल मचा दी है क्योंकि यह बयान कुछ हद तक पार्टी के सामान्य कार्यकर्ताओं की भावनाओं को प्रतिबिंबित करता है. 
 
राजनीति और समय-निर्धारण का बहुत महत्वपूर्ण संबंध है. उम्रदराज दिग्गजों ने अपने विशाल अनुभव के माध्यम से बोलने के लिए ऐसा समय चुना है जब राजनीतिक हलकों में बिहार पराजय पर चर्चा की जा रही है. यह बयान पार्टी की निर्बलता के साथ-साथ निराशाजनक हार के लिए जिम्मेदार नेताओं को बचाने के प्रयासों पर भी प्रकाश डालता है. भाजपा हमेशा से ही ऐसी पार्टी थी जो प्रत्येक पराजय के बाद हार के कारणों की जांच करती थी. वर्ष 2004 में पहली बार ऐसा हुआ जब ‘इंडिया शाइनिंग’ और ‘फील गुड फैक्टर’ अभियान को बढ़ावा देने वाले भाजपा नेताओं द्वारा सत्ता बरकरार रखने में पार्टी की विफलता के लिए ‘सामूहिक  जिम्मेदारी’ शब्द का इस्तेमाल किया गया. आडवाणी, जोशी व अन्य दिग्गजों, वर्तमान व्यवस्था का हिस्सा बने मौजूदा नेताओं की तुलना में राजनीति के व्याकरण को गंभीरतापूर्वक और बेहतर ढंग से समझते हैं. चुनाव अभियान के दौरान आरक्षण संबंधी टिप्पणियां करने के लिए आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के संचालक मोहन भागवत को वर्तमान नेतृत्व के एक वर्ग द्वारा हार के लिए जिम्मेदार ठहराने की आशंका को विचार में रखते हुए दिग्गजों ने उनके द्वारा स्थापित व पोषित संगठन की कार्यशैली पर वापस ध्यान केंद्रित किया है. इस प्रकिया में उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि हार के लिए कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि पार्टी के वरिष्ठ नेता जिम्मेदार हैं. 
 
इस समय भाजपा के शीर्ष पदाधिकारी मार्गदर्शक मंडल के बयानों से परेशानी में आ गए हैं. संकट के समय मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों से उनके कनिष्ठ सदस्यों का मार्ग प्रशस्त करने की उम्मीद की जाती है और उन्होंने ऐसा ही किया है. प्रारंभ में तीन पूर्व भाजपा अध्यक्षों, नितिन गडकरी, वेंकैया नायडू और राजनाथ सिंह, से बयान का विरोध करने के लिए कहा गया. जब गडकरी ने अपने बयान में यह संकेत भी दिया था कि मार्गदर्शक मंडल सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए. तो यह अहसास होने पर कि मंडल सदस्यों के बयान ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पदाधिकारियों पर हार का ठीकरा फोड़े जाने के प्रयास को रोका है, तब गडकरी ने भी अपने सुर बदल लिया और कहा कि पार्टी मार्गदर्शक मंडल सदस्यों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगी. बिहार पराजय ने योजना और अभियान चरण में स्थानीय नेताओं को शामिल करने की शीर्ष नेतृत्व की अक्षमता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. उदाहरण के लिए, बिहार के सबसे प्रतिष्ठित भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा अपने साथ किए गए व्यवहार को लेकर टेलीविजन पर बार-बार अपने असंतोष को अभिव्यक्त करते आ रहे हैं. पूर्व में भाजपा किसी भी विधानसभा चुनाव से पहले उसके मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशियों पर निर्णय लेने की प्रथा की हमेशा अनुपालना करती थी. लेकिन पिछले एक वर्ष में भाजपा ने अपनी रणनीति में कुछ बदलाव किए हैं. इसके परिणाम स्वरूप जिन्हें कुछ राज्यों में जीत के पश्चात मुख्यमंत्री के ओहदे से नवाजा गया है, उन्हें अब भी उनकी राजनीतिक धूर्तता का प्रदर्शन करना बाकी है. पार्टी में एक ऐसा वर्ग भी है जो पूरी तरह से मानता है कि अगर भाजपा ने जाने-पहचाने पार्टी कार्यकर्ताओं में बिहार और दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशियों की पूर्व घोषणा की होती तो पार्टी को दोनों राज्यों में शर्मनाक हार का सामना नहीं करना पड़ता. 
 
भाजपा के पूर्व दिग्गज जानते हैं कि वे प्रधानमंत्री की सीधे तौर पर आलोचना नहीं कर सकते इसलिए उन्होंने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर विशेष रूप से निशाना साधा. अब भाजपा के संगठनात्मक चुनाव होने को हैं और यह मांग अभी से उठने लगी है कि केवल उसी व्यक्ति को शीर्ष पद के लिए चुना जाए जो पार्टी और इसके वर्करों को एक साथ लेकर चलने में सक्षम हो. अन्य शब्दों में कहें तो अमित शाह को या तो गुजरात वापस भेज दिया जाए या फिर केंद्रीय मंत्रालय में समायोजित किया जाए. अगर ऐसा होता है तो यह संकेत जाएगा कि नरेंद्र मोदी के बाएं हाथ को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. बीजेपी के अंदर दिग्गजों के आभासी विद्रोह को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस विद्रोह में आरएसएस की स्वीकृति होने की भी पूरी संभावना है. भाजपा के लिए यह समय आंतरिक कलह का समय है और देश के मतदाता उत्सुकता के साथ यह देखने की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि भाजपा इस संकट से सफलतापूर्वक कैसे निपटती है.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)