मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री काल के 10 वर्षों के दौरान पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल ने सुनिश्चित किया कि नागरिक पर राज्य के नियंत्रण को और अधिक मजबूत करने के लिए तैयार किए गए कानून और नियमों को आसानी से पारित कराया जा सके. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2005, अथवा पर्यटन उद्योग को हतोत्साहित करने के लिए वीजा के बीच छह माह के अंतराल का चिदंबरम का फरमान इसके दो सुस्पष्ट उदाहरण हैं. यह यूपीए के ‘उदार’ दिनों के दौरान ही था, जब यौन उत्पीड़न से संबंधित कानूनों को अमल में लाया गया जिनका महिलाओं के खिलाफ अत्याचार पर शून्य प्रभाव पड़ा, लेकिन इससे पुलिस व प्राधिकरण अधिकारियों को समाज के पुरुष नागरिकों को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित करने का मौका जरूर मिल गया. ये कैसे हो सकता है कि जो चुनिंदा साहित्यकार, लेखक व फिल्मकार आज अपने सरकारी पुरस्कारों को लौटा रहे हैं, उनका ध्यान यूपीए के शासनकाल के दौरान ऐसे प्रतिगामी व्यवहार पर न गया हो.
 
राज्य के हाथों असहिष्णुता लंबे समय से उन लोगों के जीवन की सच्चाई रही है जो करोड़पति या अधिकारी नहीं हैं. निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भारत में ‘न्यूनतम शासन’ के मिशन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को अभी भी सफलता प्राप्त होनी बाकी है. मुमकिन है यही कारण है कि चिदंबरम और कपिल सिब्बल वर्तमान में उन स्वतंत्रताओं में अपने विश्वास का खुलेआम दम भर सकते हैं जिनका वे मंत्री के पद पर रहते हुए विरोध किया करते थे. यह चिदंबरम ही थे जिन्होंने अन्ना हजारे को गिरफ्तार कराने में अहम भूमिका निभाई थी, जबकि कपिल सिब्बल ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय में रहने के दौरान शिक्षण संस्थानों पर मजबूत सरकारी शिकंजे को सुनिश्चित किया था. यह उन अपरंपरागत तरीकों के महज दो उदाहरण हैं जिनका इस्तेमाल इन दोनों ने सत्ता में रहते हुए स्वतंत्रताओं का समर्थन करने के लिए किया था. जब राजग सरकार के तहत दूरसंचार मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में धारा-66ए का समर्थन किया लेकिन अदालत ने उसे अक्षम कर दिया तो कई लोगों को निराशा हुई. भाषण की स्वतंत्रता पर ‘आपराधिक मानहानि’ जैसे औपनिवेशिक युगीन अंकुश का विचार दुनिया के अन्य प्रमुख लोकतंत्रों में नहीं पाया जाता. इस अप्रचलित कानून का शुक्र है कि पर्याप्त संसाधनों वाला एक व्यक्ति किसी भी प्रकाशन व उसके कर्मचारियों के खिलाफ उन टिप्पणियों के लिए एक के बाद एक मुकदमा दायर कर सकता है जिन्हें अमेरिका में नीरस व साधारण समझा जाएगा. जाहिर है कि प्रकाशन कंपनी को कैद से बचने के लिए अदालत में कई बार हाजिरी लगानी होगी, जिससे उसका बहुमूल्य समय व्यर्थ होगा. जब से सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीश की गलत फोटो का प्रसारण करने के लिए (कुछ मिनटों के लिए) टेलीविजन चैनल के खिलाफ 100 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति के पक्ष में निर्णय दिया है, भारत में मीडिया ने काफी हद तक ‘न्यूनतम प्रतिरोध’ का मार्ग अपना लिया है और इस भय से भ्रष्टाचार व अपकरण के बारे में रिपोर्टिंग करने से इंकार कर दिया है कि प्रकाशन को उपलब्ध दस्तावेजी सबूत आपराधिक मानहानि के आरोप से बचने के लिए शायद पर्याप्त न हों. एक निर्दोष व्यक्ति को अस्थायी अवधि के लिए दोषी के रूप में चित्रित न किया जाना सुनिश्चित करने के लिए 99 धोखेबाजों का कानून के शिकंजे से बच निकलना कहां तक उचित है? 
 
जहां तक ‘घृणापूर्ण अपराधों’ का संबंध है, इसके लिए नए कानून बनाने से कोई खास मकसद हासिल नहीं किया जा सकता जैसा कि यूपीए शासनकाल के दौरान बलात्कार पर सख्त कानूनों के बावजूद बलात्कार मामलों की बढ़ती संख्या से मालूम पड़ता है. एक दशक पहले सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दिए गए भाषण के मामले में गृह मंत्रालय ने ‘द्वेषपूर्ण भाषण’ अभियोजन पक्षों में सफलता के लिए बहुत निम्नतर मानदंड निर्धारित किए हैं. अगर स्वामी द्वारा कहे गए शब्द अभियोज्य अपराध की श्रेणी में आते हैं, तो भारत के कई हजार राजनीतिज्ञ भी ‘द्वेषपूर्ण भाषण’ देने के आरोपियों की श्रेणी में सूचीबद्ध कर दिए जाएंगे क्योंकि उनमें से प्रत्येक ने पूर्व वाणिज्य मंत्री द्वारा गृह मंत्रालय के हलफनामों में की गई टिप्पणियों से कहीं अधिक तीक्ष्ण व कटु टिप्पणियां की हैं.इसमें कोई संदेह नहीं है कि 2014 की मोदी लहर के दौरान निर्वाचित कई स्वंयभू स्वामियों और साध्वियों को तत्काल चिकित्सीय मदद की आवश्यकता है.उम्मीद करते हैं कि चिकित्सा मिलने से उनके लक्षण कम हो जाएंगे.हालांकि, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि कुछ पागल कट्टरपंथियों की गौण संख्या को छोड़कर अधिकांश भारतीय जनता ऐसे राजनेताओं से घृणा करती है जो विभिन्न जातियों व धर्मों के नागरिकों की निंदा करते हैं, ऐसे व्यक्तियों को कैद कराने का प्रयास करने से बेहतर है कि मीडिया के माध्यम से उनकी अनुचित व गैर-जिम्मेदराना टिप्पणियों की निंदा की जाए.पोशाक, आहार और जीवनशैली की स्वतंत्रता का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करने वाले कानूनों को रद करने के माध्यम से किसी भी आकस्मिक घटना के लिए चयन के विकल्प के रूप में कानून का आदर करने के औपनिवेशिक विचार को हटाए जाने की आवश्यकता है.
 
आपराधिक मानहानि और भाषण की स्वतंत्रता पर कई प्रकार के प्रतिबंधों जैसे कालभ्रमित कानूनों को रद्द करने के साथ-साथ सूचना के अधिकार (आरटीआई) के कार्यक्षेत्र को और अधिक व्यापक और गंभीर बनाए जाने की आवश्यकता है. सुशासन के लिए पारदर्शिता आवश्यक है जबकि स्वतंत्रता नवपरिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण भाग है. भारत को सेवाओं और विर्निमाण का केन्द्र बनाने का प्रधानमंत्री का स्वपन तभी साकार होगा जब स्वतंत्रताओं का नेहरूवादी राज्य के औपनिवेशिक दायरों से आगे विस्तार किया जाएगा और जब पारदर्शिता सरकारी कार्यशैली का आदर्श बन जाएगी.जितनी शीघ्र ऐसा होगा, उतनी शीघ्र ‘असहिष्णुता’ के खिलाफ मौजूदा आंदोलन का पतन होगा.मनमोहन सिंह सरकार द्वारा व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं को पहुंचाई गई क्षति की क्षतिपूर्ति करके ही नरेंद्र मोदी सरकार अपने उन आलोचकों की तर्कहीन व असंगत निंदा को करारा जवाब दे सकती है जिन्होंने खुद सत्ता में रहते हुए प्रतिगामी कानूनों को स्थायी बनाया, लेकिन आज जब वे सत्ता से बाहर हैं तो व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं के उपासक बन गए हैं.
 
 (ये लेखक के निजी विचार हैं.)