क्या मुझे कुछ तत्काल चुनाव सुधारों के लिए निर्वाचन आयोग के समक्ष एक उत्साही याचिका करने की अनुमति है? मैं यह विनती संसद के बजाय आयोग से इसलिए कर रहा हूं क्योंकि यह सुधार करना संसद के नियंत्रण से बाहर है.क्या आयोग कृपया यह सुनिश्चित कर सकता है कि चुनाव परिणाम कभी भी रविवार को न घोषित किए जाएं? रविवार को चुनाव परिणामों की घोषणा से स्तंभकारों और राजनीतिक पंडितों के विविध समूहों को बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ता है जिन्हें रविवार के अखबारों में अपने बौद्धिक ज्ञान की उपस्थिति दर्ज कराने में परम आनंद की अनुभूति होती है. आप जानते ही हैं कि हमें किसी घटना के बाद समझदार बनने की आदत पड़ चुकी है.कृपया हमें चुनाव परिणामों से एक दिन पहले शनिवार को बुद्धिमान होने के लिए मजबूर न करें, जिस समय हमें लेखन कार्य करना होता है.यह हमारे ज्ञान, विश्लेषण और व्याख्या के सीमित संसाधनों पर अनावश्यक रूप से अतिक्रमण करता है.यह तनाव सहना बेहद कठिन है.हम इंसान ही हैं कोई मशीन नहीं.हमें अपने चेहरे पर अंडा फूटने के विचार से ही घृणा है.
 
जब बिहार चुनाव के एग्जिट पोल किसी झूले की तरह एक तरफ से दूसरी तरफ झूलते हैं, हमारी असुरक्षा की भावना और अधिक तीव्र हो जाती है.दोनों पक्ष उन भविष्यवाणियों को पढ़ सकते हैं, जो उनके माकूल हैं.एक राजनीतिक पार्टी का सदस्य, और इसलिए पक्षपातपूर्ण होने के नाते यह स्पष्ट है कि मुझे राजग के लिए 155 सीटों की चाणक्य की भविष्यवाणी सबसे सुखद प्रतीत होती है.मेरे विचार से यह अनुमान मोदी की रैलियों में भाग लेने वाली विशाल भीड़ के उत्साह व युवाओं की जबर्दस्त प्रतिक्रिया को प्रतिबिंबित करता है. भविष्यवाणी का कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए मेरे पास एक सुझाव है.मैं आशा करता हूं कि वे अपने भविष्यवाणियों को सट्टेबाजों की भविष्यवाणियों के साथ तुलना करेंगे.सट्टेबाजों की पद्धति वास्तव में कुछ ज्यादा अलग नहीं है.इसके अलावा सट्टेबाज आंकड़ों की भविष्यवाणी करने से पहले प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की जांच करते हैं.जनमत सर्वेक्षण करने वाली कंपनियां गलत हो सकती हैं, क्योंकि वे अपने चेक एडवांस में ले लेते हैं.लेकिन, सट्टेबाजों के लिए गलती की गुंजाइश बहुत कम है क्योंकि दांव पर बड़ी रकम लगी होती है.
 
कुछ चुनाव परिणामों को शनिवार के दिन घोषित किया गया था, लेकिन वे परिणाम बिहार चुनावों के पैमाने का मुकाबला नहीं कर सकते, क्योंकि बिहार चुनावों ने पूरे राष्ट्र का ध्यान आकर्षित किया हुआ है.लेकिन, इससे भविष्य में और चुनाव परिणामों को शनिवार के दिन घोषित किए जाने की संभावना और मजबूत होती है.केरल में स्थानीय चुनावों के परिणाम एक दिलचस्प कहानी बयां करते हैं.लेफ्ट फ्रंट कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ से आगे चल रहा था जिसका मतलब है कि केरल में हालात बदल गए हैं और अगले वर्ष विधानसभा चुनाव के बाद केरल में लेफ्ट की सरकार की वापसी हो सकती है. चाहे लद्दाख हो या असम या फिर केरल, देशभर से जो संदेश आ रहा है वो ये कि चुनाव में कोई भी जीते लेकिन कांग्रेस ने मतदाताओं का विश्वास खो दिया है.केरल में यूडीएफ को कांग्रेस को साथ लेकर चलने के बोझ ने दबाकर रख दिया है.लेख लिखने के समय उपलब्ध रुझानों के अनुसार कांग्रेस तिरुवनंतपुरम में निगम चुनावों में हार गई है.आश्चर्यजनक ढंग से, भाजपा ने कई जिला कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावशाली बढ़त प्राप्त की है और पलक्कड़ में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई है.शायद कांग्रेसी नेता सोचते हैं कि 2014 के पतन से अधिक बुरा और कुछ नहीं हो सकता.लेकिन, उन्हें एकबार फिर सोचने की आवश्यकता है.कांग्रेस की इस वर्ष की राजनीतिक रणनीति आम आदमी की समझ से बाहर चली गई है.लोग ढीठपन और वातोन्माद का समर्थन नहीं करेंगे.विपक्ष का काम विरोध करना होता है लेकिन उसके भी कुछ नियम होते हैं.प्रतिक्रिया हमेशा तर्कसंगत और संतुलित होनी चाहिए.राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने राई का पहाड़ बनाने में महारत हासिल कर ली है.चूंकि  यह पहाड़ हवा के बने होते हैं, इनकी हवा निकलने में अधिक देर नहीं लगती.मतदाताओं से शासन व विकास के बेतुके अवरोधों को समर्थन देने की उम्मीद नहीं की जा सकती.
 
निश्चित रूप से निर्वाचन आयोग विचारहीन नहीं है और न ही यह शासन को बाधित करने का प्रयास करता है.यह प्रभावशाली अखंडता के साथ अच्छा कार्य करता है.लेकिन, एक और गंभीर याचिका करने के लिए अभी भी पर्याप्त स्थान है, क्या यह जरूरी है कि एक राज्य में होने वाला चुनाव महीनों तक चलता जाए? ऐसा नहीं हो सकता कि हमारे प्राधिकरण के पास प्रत्येक निर्वाचन दिन में औसतन 50 विधायक सीटों से अधिक सीटों पर चुनाव कराने के लिए आवश्यक संसाधन न हों, जो बिहार की औसत थी.अनावश्यक रूप से खींचा गया चुनाव प्रभावी रूप से शासन प्रक्रिया को बाधित करता है.यहां केवल बिहार में ठहराव की ही बात नहीं की जा रही, बल्कि राष्ट्रीय ध्यान और समय के विपथन भी बात की जा रही है.यकीन मानिए, इन सुधारों के सबसे अधिक शुक्रगुजार तो स्वयं राजनीतिज्ञ होंगे.
 
(ये लेखक के निजी   विचार हैं.)