विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को छात्रों के भारी विरोध-प्रदर्शन का सामना करना पड़ रहा है, जो सरकार से इस निरपेक्ष आश्वासन की मांग कर रहे हैं कि गैर-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी) फेलोशिप योजना को समाप्त नहीं करना चाहिए और उच्च मुद्रास्फीति को देखते हुए भत्तों में इजाफा किया जाना चाहिए. गौरतलब है कि यह मांग रखने वाले अधिकांश छात्र वाम दलों से नाता रखते हैं. इस आंदोलन ने एक राजनीतिक मोड़ ले लिया है और विभिन्न राजनीतिक समूह एक दूसरे पर राजनीतिक बढ़त प्राप्त करने के लिए इस मुद्दे का सहारा ले रहे हैं.
 
मानव संसाधन विकास मंत्रालय, जिस पर जाहिर तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का दबाव है, ने इस तथ्य के बावजूद पहले से ही गैर-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी) फेलोशिप योजना को समाप्त करने के यूजीसी के निर्णय के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है ताकि इस योजना से लाभ प्राप्त करने वाला कोई भी उम्मीदवार इस से प्रभावित न हो. मंत्रालय ने राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी) और गैर-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नॉन एनईटी) फेलोशिप योजनाओं की खूबियां जानने के लिए पांच सदस्यीय समीक्षा समिति को भी नियुक्त किया है. समीक्षा समिति से दिसंबर तक उनके सुझावों को प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है ताकि सरकार इस विषय पर एक सुविचारित राय लेने के लिए सक्षम हो सके. हालांकि, वाम दल और छात्र संगठन इस निर्णय से संतुष्ट नहीं हैं और उन्होंने ऐलान कर दिया है कि समीक्षा समिति की रिपोर्ट आने और मंत्रालय द्वारा यथास्थिति बनाए रखने तक उनका विरोध-प्रदर्शन जारी रहेगा.
 
उम्मीदवारों की योग्यता और अध्ययन के चयनित क्षेत्र में शिक्षण और अनुसंधान कार्य के लिए उनकी पात्रता का आकलन करने के लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी) को 1994 में सूत्रबद्ध किया गया था. गैर-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी) फेलोशिप योजना को वर्ष 2006 में शुरू किया गया था और यह केवल केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उन 11 राज्य विश्वविद्यालयों के लिए खुली है जिन्हें उत्कृष्टता की संभावना वाले विश्वविद्यालयों (यूपीई) के रूप में जाना जाता है. इस प्रकार यह केवल 50 विश्वविद्यालयों में उपलब्ध है. वर्तमान में, लगभग 35 हजार छात्र फायदों का लाभ उठा रहे हैं. अगर मानव संसाधन विकास मंत्रालय से प्राप्त अनाधिकारिक जानकारी की मानें तो गैर-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी) फेलोशिप इसलिए शुरू की गई थी क्योंकि उस समय एक वरिष्ठ अधिकारी का बेटा नेट परीक्षा में फेल हो गया था. यूजीसी की व्याख्या के अनुसार इस योजना को एक प्रकार के बेरोजगारी भत्ते के रूप में देखा जाता है जिसे बिना उचित गुणवत्ता वाली छानबीन के सभी को अविचारपूर्वक दिया जाता है. 
 
सरकारी हलकों में ऐसा समझा जाता है कि भले ही खर्चा बढ़ता जा रहा है, लेकिन योजना के माध्यम से गुुणवत्ता अनुसंधान का उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सका. यह तर्क भी चारों ओर प्रसारित हो रहा है कि इस तथ्य के बावजूद कि नेट परीक्षा वर्ष में दो बार होती है, इस परीक्षा में फेल होने वाले उम्मीदवार को किस प्रकार शिक्षण व अनुसंधान कार्य के लिए उपयुक्त समझा जा सकता है. 
 
मंत्रालय के वरिष्ठ पदाधिकारियों की राय में पिछले एक दशक के दौरान, जब से गैर-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा लागू की गई है, चुनिंदा विश्वविद्यालयों में दोहराए जाने वाले और तर्कहीन विषयों पर पीएचडी पंजीकरण के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी है. चूंकि इस योजना ने औसत अकादमिक रिकॉर्ड वाले छात्रों को अनुसंधान में भर्ती होने के लिए केवल इसलिए आकर्षित किया ताकि उपयुक्त नौकरी पाने तक वे छात्रवृत्ति का लाभ उठा सकें.
 
यूजीसी ने यह तर्क दिया है कि विश्वविद्यालय प्राधिकरण को अनुसंधान के लिए दाखिले पर निगरानी रखने में भारी समस्याओं का सामना करना पड़ा है. छात्र संगठनों ने अनुसंधान विषय में विश्वविद्यालय प्रशासन पर अधिकतम दाखिले करने के लिए दबाव बनाया. प्रशासन अधिकांश मामलों में इन दबावों के समक्ष झुक गया और शोध करने वाले छात्रों को अस्थायी अथवा नई भर्ती किए गए लेक्चरों को नियत कर दिया गया जिनमें गुणवत्ता शोध कार्य की निगरानी करने के लिए आवश्यक क्षमता व जानकारी का अभाव है.
 
एक वित्तीय तर्क यह है कि यूजीसी ने 2014-15 में 99.16 करोड़ रुपए का खर्च किया और वो भी केवल 39 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में. एक बार 16 नए केंद्रीय विश्वद्यिालयों द्वारा अपने 20 विभागों को परिचालित करने के बाद यह खर्च बढ़कर 200 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा. 
 
हालांकि, सरकार को इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि नौकरियों के अभाव में, कुछ गैर-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा छात्रों को आबंटित की जाने वाली राशि उनके शैक्षणिक जीवन को जारी रखने के लिए इस्तेमाल की जाती है. वहीं दूसरी ओर, शोध कार्य के मानकों पर किसी भी हाल में समझौता नहीं किया जाना चाहिए और पूरा जोर केवल उत्कृष्टता और योग्यता पर दिया जाना चाहिए. जब शोध कार्य के लिए दो भिन्न नीतियां नहीं हैं तो राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) और गैर-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नॉन नेट) की दो धाराएं क्यों? नेट सीटों की संख्या में इजाफा किया जा सकता है. पश्चिमी विश्वविद्यालयों के विपरीत, हमारे विश्वविद्यालयों ने अनुसंधान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार विजेताओं और अग्रणियों का उत्पादन नहीं किया है. यहां तक कि ‘नेट फेलोशिप’ शब्द भी बहुत भ्रामक है और इसके स्थान पर राष्ट्रीय अनुसंधान पात्रता परीक्षा (एनआरईटी) का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. आंदोलन करने वाले छात्र किसी भी निर्णय द्वारा प्रभावित नहीं हैं, लिहाजा उन्हें राजनीति को दूर रखकर खुले दिमाग के साथ बातचीत करनी चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)