यह स्तंभकार पिछले 3 वर्षों से दावा करता आ रहा है कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी को उनके शत्रुओं से कम और मित्रों से अधिक बच कर रहना होगा, क्योंकि प्रधानमंत्री के कुछ मित्र अभी तक इस हकीकत को पचा नहीं पा रहे हैं कि बचपन में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाला एक बालक आज देश के शीर्षतम राजनीतिक पद पर स्थापित है. उनकी अपनी पार्टी ‘भारतीय जनता पार्टी’ ही सबसे दृष्टतम अपराधी है जिसने हर राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के प्रचार का जिम्मा प्रधानमंत्री मोदी के कंधों पर डाल रखा है. इस समय देश के आर्थिक मुद्दों के समाधान के लिए प्रधानमंत्री के कीमती समय व उनके गंभीर ध्यान की सबसे अधिक आवश्यकता है. हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और अब बिहार में, मतदाताओं से ‘वोट फॉर मोदी’ का आह्वान करके भाजपा वास्तव में भारतीय प्रधानमंत्री को राज्य के नेता के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि मतदाता खुद इस तथ्य से भली-भांति परिचित हैं कि वे भले ही मोदी के नाम पर भाजपा के पक्ष में मतदान करें लेकिन नरेंद्र मोदी उनके राज्य का अगला मुख्यमंत्री नहीं बनने वाले.
 
गत वर्ष देश के मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी के पक्ष में भारी मतदान करते हुए और अधिक जिम्मेदारी सौंपते हुए उन्हें स्पष्ट बहुमत से जीत दिलाई थी, लेकिन भाजपा अब भी विभिन्न राज्यों में मोदी की लोकप्रियता को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही और हर राज्य में होने वाले चुनाव में उन्हें ही भाजपा के कर्ता-धर्ता के रूप में स्थानीय मतदाताओं के समक्ष पेश कर रही है. कृपया नरेंद्र मोदी को भारत सरकार चलाने के सबसे महत्वपूर्ण कार्य पर ध्यान एकाग्र करने दें व उनके बहुमूल्य समय का सम्मान किया जाए क्योंकि राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारियां और भी हैं.
 
नई सरकार ने अपने प्रथम आर्थिक सर्वेक्षण में यूपीए सरकार के अर्थव्यवस्था प्रबंधन को ‘सक्षम’ बताया है जबकि चुनाव अभियान में इसी भाजपा ने यूपीए सरकार के अर्थव्यवस्था प्रबंधन को ‘विनाशकारी’ बताया था. इस प्रकार नई सरकार शुरुआत में ही धारणाओं के खेल में पिछड़ गई. प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था की दशा सुधारने के लिए मेक इन इंडिया, डिजीटल इंडिया और स्मार्ट सिटी जैसी योजनाओं की घोषणा की. प्रधानमंत्री के इन नवीन विचारों पर ठोस प्रगति करने का काम उनके मंत्रिमंडल और आधिकारिक टीम का था. आर्थिक सुधार के तमाम प्रयासों के बावजूद टीम मोदी से अपेक्षित प्रगति और दक्षता दिखाई नहीं दे रही है. बैंकिंग प्रणाली इसका एक स्पष्ट उदाहरण है जिसका बड़ा हिस्सा गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) से अवरुद्ध हुआ पड़ा है. जिन्होंने बैंकों से कर्ज लिया है उन्हें अपना हिस्सा जब्त कराने और अन्य निवेशकों को बेचने की आवश्यकता है, ताकि अस्थिर वित्तीय स्थिति वाले बैंकों को अतिरिक्त पूंजी प्रदान की जा सके. यूपीए सरकार का उच्च कर दरों को जारी रखना एक पारंपरिक विकल्प था. प्रत्यक्ष करों में कटौती से शेयर बाजार में उछाल आ सकता था जिससे वर्णित गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का बोझ उतारा जा सकता था.
 
विशेष जांच दल (स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम) की प्रतिबंधात्मक सिफारिशों का पालन करने के बजाय मोदी सरकार से प्रतिबंधों को हटाने और घरेलू व विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए निर्विघ्न प्रक्रिया सुनिश्चित करने की उम्मीद की जाती है. उदाहरण के लिए, रक्षा क्षेत्र में विदेशी स्वामित्व को 49 फीसदी तक सीमित करने का कोई तुक नहीं बनता. भारत कोई अविकसित व छोटा देश नहीं है और 100 फीसदी विदेशी स्वामित्व वाली कंपनी भी भारतीय प्राधिकरण के नियंत्रण के अधीन रहेगी जैसा विश्व की दो अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, चीन व अमेरिका में होता है. हालांकि, इसके साथ ही विश्व स्तर पर विकसित होने के लिए घरेलू उद्योग के लिए अनुकूल नीतियों को लागू किया जाना चाहिए.
 
भारतीय जनसंख्या को ‘गूगल’ व ‘फेसबुक’ का अभ्यस्त होने देने के बजाय ऐसे उत्पादों के स्थानीय संस्करणों के विकास की आवश्यकता है, जैसा कि चीन ने किया है. मार्क जुकरबर्ग को भारत से नहीं बल्कि अपने करोड़ों डॉलर से प्रेम है और भारत सरकार को उनके द्वारा दी गई इच्छा सूची पर विचार करने के दौरान इस तथ्य पर विचार करने की आवश्यकता है. दूरसंचार विभाग के उच्चतम पदों पर सामान्यवादियों के स्थान पर परिवर्तनात्मक भावना से परिपूर्ण व कार्यक्षेत्र का समुचित ज्ञान रखने वाले योग्य उम्मीदवारों को भर्ती किया जाना चाहिए. दूरसंचार के अतिरिक्त असंरचना, ऊर्जा व शहरी विकास ऐसे क्षेत्र हैं जहां महत्वपूर्ण निवेश, नई भर्तियां व नीतिगत बदलाव अत्यावश्यक बन गए हैं, लेकिन ऐसा होने के लिए प्रधानमंत्री को पर्याप्त राहत दिए जाने की जरूरत है ताकि वह शासन पर ध्यान केंद्रित कर सकें.
 
रुपए के गिरते मूल्य के बावजूद निर्यात में तेजी से गिरावट आ रही है और जबकि अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और लालच पर लगातार बयान दिए जा रहे हैं, घरेलू सेवाओं और वस्तुओं पर व्यय होने के बजाय काला धन अभी भी विदेश भेजा जा रहा है. अन्य शब्दों में कहें जो जिस पैसे से देश में रोजगार सृजन होना चाहिए था, उस पैसे वे विदेशों में रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं. 
 
कार्यकाल में तकरीबन दो वर्ष बिताने के बाद, केवल वायदों मात्र से मतदाताओं के संतुष्ट होने की मियाद भी समाप्त हो गई है.मतदाता अब वायदे नहीं बल्कि ठोस प्रदर्शन चाहते हैं और वायदों को पूरा कर दिखाने व ठोस परिणाम प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री को शासन संबंधित मामलों पर ध्यान देने व समय समर्पित करने की आवश्यकता है. ऐसा तभी संभव है जब भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री को तुच्छ राजनीति से दूर रखे. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)