साल 2009 में जब मुंबई की धरती सीनियर क्राइम रिपोर्टर जे.डे. के खून से लाल हुई थी तो छोटा राजन एक खलनायक के रूप में सामने आया था. इससे पहले वह मोस्ट वांटेड सिर्फ कागजी तौर पर था, भारतीय सुरक्षा एजेंसियां कभी उसे अरेस्ट करने के मूड में नहीं थीं. जे.डे. एक ऐसे पत्रकार थे जो न केवल अंडरवर्ल्ड को भीतर से जानते और समझते थे, बल्कि उनकी लिखी किताबें आज भी अंडरवर्ल्ड की अंदरूनी दुनिया की सबसे विश्वनीय किताबों में गिनी जाती हैं. जे.डे. की हत्या क्यों और किन परिस्थितियों में हुई, यह राज तो जे.डे. के साथ ही दफन हो गया, पर इस कहानी का सबसे बड़ा किरदार छोटा राजन के रूप में मौजूद है. मोस्ट वांटेड दाऊद इब्राहिम के खिलाफ भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सबसे अचूक हथियार के रूप में मौजूद छोटा राजन का इतनी आसानी से गिरफ्तार हो जाना अपने आप में कई कहानियों को जन्म दे चुका है.
 
बाबरी विध्वंस के बाद मुंबई बम धमाकों से ठीक पहले तक दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन की जोड़ी मुंबई पर राज करती थी. लेकिन, बम धमाकों के बाद दोनों के बीच तलवारें खिंच गर्इं और इसके साथ ही मुंबई अंडरवर्ल्ड भी सांप्रदायिकता के तौर पर बंट गया. मुसलमानों का रहनुमा बना पाकिस्तान में छिपकर बैठा दाऊद इब्राहिम, जबकि दूसरी तरफ छोटा राजन ने खुलेआम खुद को हिंदू डॉन घोषित कर दिया. मुंबई धमाकों का बदला लेने के लिए दाऊद इब्राहिम को खत्म करने की कसम खाने वाला छोटा राजन पिछले दिनों इंडोनेशिया पुलिस की गिरफ्त में इतनी आसानी से आ गया जैसे वह छोटा बच्चा हो. एयरपोर्ट पर उसे शक के आधार पर पकड़ा गया. छोटा राजन की गिरफ्तारी भले ही बड़ी आसानी से हो गई है, पर यह कहानी इतनी आसान भी नहीं है. गिरफ्तारी के बाद मीडिया से थोड़ी बहुत बातचीत में जिस तरह छोटा राजन ने भारत आने की बात दोहराई है वह यूं ही नहीं है. इसके पीछे एक ऐसा राज छिपा है जिसकी शुरुआत दाऊद इब्राहिम के पतन से शुरू होती है.
 
मुंबई बम धमाकों के बाद जिस तरह छोटा राजन और दाऊद इब्राहिम अलग हुए थे, उसने दाऊद को भारत का सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया था. वहीं, छोटा राजन कहीं न कहीं हीरो के रूप में उभरा था. दाऊद के सबसे बड़े राजदार को भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने भी हाथों-हाथ लिया था, शायद यही कारण था कि दाऊद के मुंबई नेटवर्क की कमर तोड़ने में एजेंसियों को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी थी. हालांकि, छोटा राजन को भी इसकी भरपूर कीमत चुकानी पड़ी थी, पर यह कीमत दाऊद के नेटवर्क को तोड़ने से बड़ी नहीं थी.
 
अब जबकि छोटा राजन गिरफ्तार है और भारतीय सुरक्षा एजेंसियां उसको भारत लाने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रही है, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर ऐसा संभव कैसे हो सका? यहां एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की चर्चा लाजिमी हो जाती है. उत्तराखंड का रहने वाला यह सुरक्षा अधिकारी सही मायनों में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का कंप्यूटराइज दिमाग है. अजीत डोभाल को ऐसे ऑपरेशंस का सबसे शातिर अधिकारी माना जाता है. हाल के दिनों में जिस तरह दाऊद इब्राहिम के खिलाफ भारत ने मोर्चाबंदी शुरू की है, उसी कड़ी में छोटा राजन की गिरफ्तारी को देखने की जरूरत है.
 
कांग्रेस की मनमोहन सरकार के दौरान भी अजीत डोभाल छोटा राजन के मामले में चर्चा में आए थे. मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र आया था कि अजीत डोभाल को छोटा राजन के सबसे करीबी साथी रहे विकी मल्होत्रा के साथ देखा गया था. उस वक्त विकी मल्होत्रा सुरक्षा एजेंसियों की रडार पर था. रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अजीत डोभाल पर कार्रवाई करने के पक्ष में थे, पर बाद में यह पता चलने पर कि यह एक सीक्रेट मिशन था, कार्रवाई टाल दी गई. अब एक बार फिर से विकी मल्होत्रा चर्चा में है. अंडरवर्ल्ड से ताल्लुक रखने वालों की मानें तो छोटा राजन की गद्दी अघोषित रूप से विकी मल्होत्रा को ही ट्रांसफर कर दी गई है. साथ ही विकी मल्होत्रा ही छोटा राजन और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों या यूं कहें कि सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बीच सेतु बना है. 
छोटा राजन को भारत लाकर भारतीय सुरक्षा एजेंसियां एक साथ कई मोर्चे पर काम कर सकती हैं. सबसे बड़ी चुनौती दाऊद इब्राहिम को ढेर करने या उसे भारत लाने की है. कई बार यह बातें सामने आ चुकी हैं कि क्यों नहीं जिस तरह अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में घुसकर मारा था उसी तरह दाऊद इब्राहिम को ढेर कर दिया जाए. अगर सही में भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इसी थ्योरी पर काम कर रही हैं तो छोटा राजन से बड़ा मददगार कोई दूसरा नहीं हो सकता. ऐसा नहीं है कि छोटा राजन पहली बार गिरफ्तार हुआ है. इससे पहले भी उसे 15 साल पहले साल 2000 में थाईलैंड में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन वह हॉस्पिटल से पुलिस को चकमा देकर फरार हो गया था. कहा जाता है कि उसे भगाने में भारतीय सुरक्षा एजेंसी ‘रॉ’ ने महत्वपूर्ण रोल प्ले किया था. एक बार फिर छोटा राजन कब्जे में है, पर उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा यह सच बयां करने के लिए काफी है कि उसे न तो डर है और न अफसोस. अंडरवर्ल्ड से ताल्लुक रखने वाले भी मान रहे हैं कि जिस तरह पाकिस्तान में दाऊद इब्राहिम सेफ हैंड में है ठीक उसी तरह अब छोटा राजन भी सेफ हैंड में आ चुका है. देखना होगा कि छोटा राजन सेफ हैंड के लिए कितना मददगार साबित होगा.
 
पर मंथन यह भी करना होगा कि क्या एक अपराधी के खात्मे के लिए दूसरे अपराधी को संरक्षण देना न्याय संगत है. छोटा राजन पर करीब 70 मुकदमे भारत में दर्ज हैं. इनमें से कई हत्या के भी हैं. पत्रकार जे.डे. की हत्या भी इनमें से एक है. ऐसे में क्या छोटा राजन कभी कड़ी सजा का हकदार बन सकेगा? या फिर अपनी बाकी की जिंदगी भारत की जेलों में फाइव स्टार सुविधाओं के बीच काटेगा. फिलहाल, छोटा राजन को भारत लाए जाने का इंतजार है.