स्वर्णिम और दागदार इतिहास को संजोये भारतीय संस्कृति वर्तमान में किसके अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, इस तथ्य को लेकर हम सब भ्रमित हैं. हम हर बात और कार्य के शुरू होने के पहले ही उसकी कमियां निकालकर इतना दागदार कर देते हैं कि वह ‘बलात्कार’ का शिकार हो जाती है. हम ख्वाब तो समृद्ध भारत के देखते हैं मगर करते बिल्कुल उलट हैं. बीते सप्ताह घटित हुई कुछ घटनाओं ने हमें उद्देलित किया. 

एक घटना देश के ‘पीसफुल सिटी-सिटी ब्यूटीफुल’ का तमगा लेकर घूमने वाले देश के पहले नियोजित शहर चंडीगढ़ में हुई. यहां एक साढ़े तीन साल की बच्ची के साथ वह हुआ जिसकी कल्पना करके ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. बलात्कारी मानसिकता ने उसे मार डाला. यह सिर्फ हत्या होती तो भी बर्दाश्त कर लेते मगर जो दुष्कर्म बच्ची के साथ हुआ वह तो मानसिकता की विकृति का जीता-जागता उदाहरण है. उस मासूम बच्ची को हवस का शिकार बनाया गया जो इस दुनिया के वहशी लोगों को भी बहुत अच्छा समझती थी. दूसरी घटना दिल्ली में फिर हुई, जहां एक टैक्सी वाले ने एक लड़की को अपना शिकार बनाने की कोशिश की और तीसरी घटना दिल्ली बॉर्डर स्थित हरियाणा के एक प्रतिष्ठित समझे जाने वाले जिंदल विश्वविद्यालय में एक लड़की के साथ गैंगरेप के रूप में सामने आई. आखिर हम जा किस दिशा में रहे हैं और हम कर क्या रहे हैं? 

सरकारें मानसिकता नहीं बदल सकती हैं और पुलिस इस तरह के अपराधों को नहीं रोक सकती है क्योंकि यह समाज में आई विकृति का परिणाम है. हम बातें भले ही ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की करते हैं मगर हमारा व्यवहार इसी कुटुंब का बलात्कार करने का होता है. हम किसी का नहीं बल्कि अपना हित साधते हैं, चाहे उसके लिए हम किसी के भी चरित्र का हनन कर दें या किसी को भी नग्न. एक तथ्य सर्वविदित है कि भौतिकवादी तड़क-भड़क और पाश्चात्य संस्कृति की होड़ में हम आगे निकलने लगे हैं. अश्लील साहित्य, सोशल मीडिया और हिंसा-मारधाड़ तथा उत्तेजक दृश्य परोसने वाली फिल्मों, धारावाहिकों ने हमें संस्कारहीनता की ओर बढ़ा दिया है. 

बढ़ते अपराधों और नारी उत्पीड़न की घटनाओं से यह साबित होता है कि नैतिक मूल्यों का अब कोई मोल नहीं रहा है. धारावाहिकों में भी बेवजह अंग प्रदर्शन ने परिवारों तथा समाज संक्रमित किया है. हम इस बारे में चर्चा भी नहीं करना चाहते हैं. यही हमारी बलात्कारी मानसिकता का हिस्सा बन जाता है. हाल के दिनों में मीडिया के एक वर्ग और राजनीतिक दल के लोगों ने ‘नेहरू-गांधी’ के व्यक्तित्व को दागदार बनाने का बीड़ा उठा लिया है. कोई भी किसी भी तरह का आरोप लगाकर चर्चा शुरू कर देता है. जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग उसे हवा देते हैं, जिससे उनकी कमियां छिप सकें. इतिहास को भी तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है. 

पंडित जवाहर लाल नेहरू हों या फिर महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी इन तीनों ने देश के लिए जो किया है, उनका कर्जदार पूरा देश है. पंडित नेहरू के ‘सुशासन’ पर कभी कोई सवाल नहीं उठा. उन्होंने जीते जी देश को जो दिया उससे कम मरने के बाद भी नहीं दिया. पंडित नेहरू ने अपनी समस्त पुश्तैनी संपत्ति इस देश को समर्पित कर दी. उन्होंने अपनी बेटी को न तो कभी कोई पद दिया और न ही संपत्ति में कोई हिस्सा. उनके वक्त में विपरीत हालातों के बावजूद देश हर क्षेत्र में बड़ी तेजी से आगे भी बढ़ा और अपने पांव पर खड़ा हुआ. इंदिरा गांधी ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाए और देश की सीमाओं को चहुंओर से सशक्त किया. उन्हें ‘अटल बिहारी वाजपेयी’ ने भी ‘आयरन लेडी’ कहकर पुकारा था. अमेरिका से लेकर हर महाशक्ति उनके आगे नतमस्तक होती थी. मौजूदा वक्त में इन दोनों हस्तियों के चरित्र हनन का काम हो रहा है. 

कुछ संगठन और राजनीतिक दल सिर्फ एक अभियान में जुट गए हैं कि किस तरह से नेहरू-गांधी द्वारा किए गए देशहित के कार्यों पर धूल डाली जाए और उन्हें राष्ट्र रक्षक के बजाय राष्ट्र भक्षक की भूमिका में दर्शाया जाए. इन लोगों द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को कभी अंग्रेजों का एजेंट बताया जाता है तो कभी पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी को देश का दुश्मन बना दिया जाता है. यह सब करते वक्त यह संगठन भूल जाता है कि जब देश की आजादी की लड़ाई चल रही थी तब इन लोगों ने पूरे देश के लोगों के साथ मिलकर इसे एक सकारात्मक रूप दिया था, जिसने अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए विवश किया. उस वक्त इस संगठन के लोग कहां थे और उन्होंने आजादी की लड़ाई में क्या योगदान दिया? इस बारे में उनके पास कोई जवाब नहीं होता है. खुद की कमियां ढकने के लिए दूसरे पर आरोपों की झड़ी लगाने की राजनीति हो रही है. ऐसी राजनीति जो देश के लिए करने मरने वालों के साथ बलात्कार करती है. 

ऐसा ही होता रहा तो एक वक्त यह आएगा कि हर कोई सोचेगा कि आखिर देश के लिए करने का फायदा क्या है क्योंकि देश के लिए मरने के बाद भी देश में हमें सम्मान कम अपमान ज्यादा मिलेगा. हमारे राजनीतिज्ञ और कथित सामाजिक राष्ट्रवादी संगठन आखिर इस बात का बीड़ा क्यों नहीं उठाते हैं कि वो सामाजिक बुराइयों को खत्म करने का आंदोलन करें. वह इस बात का बीड़ा क्यों नहीं उठाते हैं कि मानसिक विकृतियों को खत्म किया जाए. वह इस बात का बीड़ा क्यों नहीं उठाते हैं कि सर्वजनहित के लिए नीतियां बनाने और उनपर अमल करवाने की लड़ाई लड़ें. वह नई इमारतें खड़ी करने और योजनाएं बनवाने की दिशा में काम क्यों नहीं करते हैं क्योंकि सिर्फ नाम बदलने से देश का भला होने वाला नहीं है. 

सरकार में बैठे सियासतदां की जिम्मेदारी है कि वह देश की विभिन्न घटनाओं और महत्वपूर्ण तथ्यों को परखने के लिए खुफिया तरीके से जासूसी करवाएं. वह आमजन के बारे में भी सूचनाएं अर्जित करें. वह लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए काम करें. हालात बिल्कुल उलट हैं. आमजन को कुछ नया देने के बजाय पुराने को ही बर्तन बदल कर बांटा जा रहा है. नया कुछ हो नहीं रहा और पुराने कामों में खामियां निकाली जा रही हैं. हमारे देश के सिरमौर रहे नेताओं के चरित्र से बलात्कार हो रहा है. हमारे देश की जनता की भावनाओं का बलात्कार हो रहा है. हमारी बच्चियों से बलात्कार हो रहा है. हमारे अधिकारों से बलात्कार हो रहा है. हमारी भावनाओं से बलात्कार हो रहा है. 

हालात ये बन गए हैं कि हमारे देश का आवाम यही नहीं समझ पा रहा है कि आखिर बलात्कार किसका किया जा रहा है, उसका या किसी नेता का? हमें और हमारे नीति नियंताओं को सचेत रहना होगा इस बलात्कारी मानसिकता से ग्रस्त लोगों से जो सिर्फ दूसरों की आलोचनाएं करके अपनी उपलब्धियां हासिल करना चाहते हैं. हमें उन लोगों को गले लगाना होगा जो आलोचनाएं नहीं बल्कि रचनात्मक दिशा में काम करने पर यकीन रखते हैं. अगर हम इन्हीं बलात्कारियों के दिखाए रास्ते पर आगे बढ़ेंगे तो हम अपना सबकुछ लुटा बैठेंगे. जय हिंद!

( ये लेखक के निजी विचार हैं )

अजय शुक्ल ‘आज समाज’ के  ग्रुप एडिटर हैं.