सुभाष चंद्र बोस को लेकर जिस पल से युद्ध के धुएं से यह खबर आई कि जिस विमान में इंडियन नेशनल आर्मी के करिश्माई नेता सुभाष चंद्र बोस यात्रा कर रहे थे, वह विमान 18 अगस्त 1945 को ताइपे में दुर्घटनाग्रस्त हो गया है, तब से उनका भाग्य दो शब्द, ‘मृत’ और ‘गायब’ की वैकल्पिक कथाओं में आच्छादित रह गया. इनमें पहला, संस्थापन का अधिमानित निष्कर्ष था और दूसरा भारत के लोगों का नजरिया. अगर हम जानना चाहते हैं कि एक घटना की व्याख्या को लेकर इतना नाटकीय टकराव क्यों है तो हमें 1945 के संस्थापन द्वारा वर्णित व्याख्या की प्रशंसा करनी चाहिए. दूसरे विश्व युद्ध के समय जापान के आत्मसमर्पण करने के केवल तीन दिन बाद ही बोस का विमान क्रैश हो गया. संयुक्त राष्ट्र, जो उस समय सहयोगी राष्ट्रों का नेतृत्व कर रहे अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन का औपचारिक नाम था, एक्सिस सुप्रीमोज पर औपचारिक रूप से जीत का दावा कर सकता था जिसका नेतृत्व जर्मनी, जापान व इटली द्वारा किया जा रहा था. चूंकि महात्मा गांधी ने इन कारणों से युद्ध से कांग्रेस का समर्थन वापस ले लिया था कि भारत के लोगों के साथ विचार-विमर्श नहीं किया गया, फिर भी ब्रिटिश राज के अधीन भारत की वैध सरकार ने, ब्रिटिश राज, रियासतों की सेनाओं के साथ भारतीय सशस्त्र सेवाओं को युद्ध में ले गई. यहां भारतीय सेना ने अफ्रीका में जर्मनी और दक्षिणी-पूर्वी एशिया में जापान के खिलाफ युद्ध लड़ा. इसका औपचारिक विरोध होने पर भी कांग्रेस ने सशस्त्र बलों में किसी भी प्रकार का विद्रोह भड़काने के ब्रिटिश युद्ध प्रयास को नाकाम करने का प्रयास नहीं किया पर जिस आदमी ने यह काम किया,  वह सुभाष चंद्र बोस थे, जो 1939 में कांग्रेस और गांधी से अलग हो गए थे. 

1941 में कोलकाता से उनके अद्भुत बचाव अफगानिस्तान व मध्य एशिया के रास्ते बंगाल से लेकर बर्लिन तक की खतरनाक जमीनी यात्रा, एक्सिस सुप्रीमोज के आकाओं के साथ उनकी ऐतिहासिक बैठकों, जापान तक की उनकी गुप्त पनडुब्बी यात्रा और उसके बाद जापान द्वारा युद्धबंदियों के रूप में बंधक बनाए गए भारतीय सेना के अधिकारियों व सैनिकों की जुझारू इकाइयों के उनके बेमिसाल संघटन के साथ सुभाष चंद्र बोस ने भारतीयों, विशेष रूप से युवा भारतीयों की कल्पना को आकर्षित कर लिया था. ब्रिटिश राज, जो अभी भी 1857 की यादों से भयभीत था, को इस ‘गदर’ ने और क्रोधित कर दिया था. ब्रिटिश राज जानता था कि वह ब्रिटिश भारतीय सेना की वफादारी पर आश्रित है. अगर इस वफादारी में दरार आ जाती तो ब्रिटिश राज अपनी हुकूमत बरकरार नहीं रख सकती थी और बिना भारत के ब्रिटिश साम्राज्य बिखर जाता. युद्ध के कुछ ही समय बाद मुंबई में हुए नौसेना विद्रोह में बोस के प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था. हालांकि बोस और उनकी इंडियन नेशनल आर्मी भले ही युद्ध में पराजित हो गई, लेकिन उन्होंने लोगों का दिल जीत लिया था जो अपने आप में एक बड़ी विजय थी. बोस एक ऐसे वीर नायक थे जिसे भारत ने एक सदी से नहीं देखा था.भारतीयों के लिए वह देशद्रोही नहीं, बल्कि शहीद थे. जब 1946 में ब्रिटिश राज ने इंडियन नेशनल आर्मी के अधिकारियों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया तो देशभर में बड़े पैमाने पर बगावत हुई.  अंग्रेजों ने भारत छोड़ने की तैयारी शुरू की पर उनके पास तब भी ऐसी योजनाएं थीं जिन्हें वह इस देश में छोड़ना चाहते थे. राजनीतिक ताकतों की दिलचस्प मिलीभगत का सम्मिलित रूप से एक लक्ष्य था- बोस की अनुपस्थिति. बोस के प्रति अंग्रेज अडिग रूप से आक्रामक थे. कांग्रेस को वश में किया जा सकता था, लेकिन बोस को हरगिज नहीं. मुस्लिम लीग बोस को नहीं चाहती थी क्योंकि जिस प्रेरणादायक तरीके से बोस ने इंडियन नेशनल आर्मी में हिंदू-मुस्लिम-सिख एकता को सम्मिलित किया था, वह उनके सपनों के भारत के लिए स्पष्ट आदर्श था. बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया से अपने रेडियो प्रसारण में जिन्ना और पाकिस्तान की संभावना की कड़े शब्दों में आलोचना की. 

इस समय बोस के भारत में होने से, विभाजन को एक जोशीला प्रतिद्वंद्वी मिला था. साथ ही कांग्रेस स्पष्ट कारणों से बोस को वापस नहीं चाहती थी, क्योंकि तब वह उस शक्ति के दावेदार होते जो पार्टी व उसके नेता जवाहरलाल नेहरू को स्वयं के लिए चाहिए थी. अगर नेहरू को यकीन था कि बोस की मौत हो चुकी है तो वह बोस के परिवार की जासूसी करना क्यों जारी रखते? 1957 की अपनी जापान यात्रा में नेहरू घबराए हुए क्यों थे, जैसा कि दस्तावेज प्रमाणित करते हैं? अगर बोस विमान दुर्घटना से बच निकले थे, तो उन्हें कहां ले जाया गया?  कब और कहां उनकी वास्तव में मौत हुई? हमें सच्चाई का पता नहीं है. हमारे पास केवल यह आधिकारिक विवरण है कि सत्य उजागर करना मित्र राष्ट्रों के साथ संबंधों में कड़वाहट ला सकता है. वहीं ब्रिटेन एक ऐसा राष्ट है जिसने नेहरू की आधीनता में बोस के खिलाफ ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया था. ऐसा भी सुनने में आया है कि स्टालिन का सोवियत संघ, दूसरा राष्ट्र था जो 1945 में ब्रिटेन का मित्र राष्ट्र था. जाहिर तौर पर स्टालिन को बताया गया था कि बोस एक बेरहम चरमपंथी हैं, लेकिन जब तक हमें गोपनीय रखी गई फाइलों से और सूचना नही मिल जाती, हम यकीनी तौर पर कुछ भी नहीं कह सकते. राजनीतिक गणना सरल है. बोस की आयु नेहरू से आठ वर्ष कम थी, उनके पक्ष में समय था. बोस और उनकी पार्टी, 1952 तक बंगाल और ओडिशा में सत्ता में आ चुकी होती. बोस ने विपक्षी गठबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मोहित कर दिया होता, 1957 तक कांग्रेस की ताकत को कम कर दिया होता और 1962 के आम चुनावों में उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया होता. क्या तब चीन भारत पर आक्रमण करता? हम कुछ नहीं कह सकते. लेकिन जो निर्विवाद है वो ये कि स्वतंत्र भारत का इतिहास, एक अलग ही कहानी होता. 

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)

एमजे अकबर वरिष्ठ पत्रकार और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.